सामान्य से कम मानसून की संभावना और भीषण गर्मी के कारण अनाज, दालों और सब्जियों की पैदावार कम हो जाती है। टमाटर, प्याज व हरी सब्जियों जैसी फसलें चक्रवात, सूखे और भारी बारिश के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं, जिससे इनकी कीमतों में रातों-रात उछाल आ जाता है।
उत्पादन में गिरावट: खराब मौसम के कारण उत्पादन घटता है, जिससे बाज़ार में आपूर्ति कम हो जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं।
वैश्विक और भू-राजनीतिक कारक
अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का सीधा असर भारतीय रसोई पर पड़ता है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन और खेती की मशीनों का खर्च बढ़ जाता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय तनावों के कारण महंगे उर्वरक और एलपीजी की आपूर्ति में बाधा आने से खाना बनाना और उगाना दोनों महंगा हो जाता है।
आयात पर निर्भरता: भारत खाद्य तेल और दालों के लिए आयात पर निर्भरता है और वैश्विक बाजार में इन चीजों के दाम बढ़ने पर भारत में भी कीमतें बढ़ जाती हैं।
सप्लाई चेन में रुकावट: ‘स्ट्रेट-ऑफ़-होर्मुज’ जैसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों में बाधा आने से कृषि कच्चे माल की कीमतें बढ़ने की आशंका बराबर बनी हुई है।
सरकारी नीतियां और लागत
न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि: किसानों को सुरक्षा देने के लिए सरकार द्वारा न्यूनतन समर्थन मूल्य बढ़ाए जाने से अनाज और चीनी जैसी चीजों की कीमतों पर असर पड़ता है।
भंडारण और वितरण की कमी: आधुनिक कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं की कमी के कारण फसल कटाई के बाद काफी नुकसान होता है, जिससे बाजार में उपलब्धता कम हो जाती है।
बाहरी तैयार भोजन की लागत
गैस का अभाव: कमर्शियल गैस सिलेंडरों की कीमतों में वृद्धि व सामयिक अभाव के कारण स्ट्रीट फूड, चाय और रेस्टोरेंट का खाना महंगा हो जाता है।
जटिल तैयारी: भारतीय भोजन में कई प्रकार के मसालों और लंबी तैयारी की आवश्यकता होती है, जो श्रम और सामग्री की लागत को बढ़ा देती है।




























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