हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 25 मार्च का दिन एक ऐसे बलिदान का साक्षी है, जिसने कलम और कर्म दोनों से देश को नई दिशा दी। तेजस्वी पत्रकार, निडर स्वतंत्रता सेनानी और मानवता के रक्षक गणेश शंकर विद्यार्थी ने सन् 1931 में 25 मार्च को कानपुर के सांप्रदायिक दंगों में लोगों की जान बचाते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका बलिदान आज भी हमें याद दिलाता है कि मानवता का धर्म सबसे ऊपर है।
गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से समचारपत्र ‘प्रताप’ का संपादन किया, जो उस दौर में क्रांतिकारियों और ग़रीबों की आवाज़ बन गया था। उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया था, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों और छुआछूत पर भी कड़ा प्रहार किया। भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को ‘प्रताप’ के दफ्तर में ही शरण और पहचान मिली थी।
बलिदान ऐतिहासिक क्षण
25 मार्च 1931 में जब देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के शोक में डूबा था, तब कानपुर में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। पूरा शहर आग की लपटों में झुलस रहा था और नफरत चरम पर थी। ऐसे में विद्यार्थी जी निहत्थे दंगाइयों के बीच कूद पड़े और उन्होंने अकेले ही सैकड़ों हिंदुओं और मुसलमानों की जान बचाई।
हज़ारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने के बाद, उन्मादी भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। 25 मार्च 1931 को मानवता का यह सच्चा सिपाही दंगों की भेंट चढ़ गया। उनकी शहादत पर महात्मा गांधी ने कहा था— ‘काश! मुझे भी ऐसी ही मौत नसीब होती।’
पत्रकारिता क्या है?
गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन संदेश आज के समय में और अनुकरणीय है। उन्होंने सिखाया कि पत्रकारिता का धर्म सत्ता की चाटुकारिता नहीं, बल्कि जनहित और सत्य के पक्ष में खड़ा होना है। उनका बलिदान हमें सतर्क करता है कि सांप्रदायिकता और नफरत केवल विनाश लाती है, जबकि प्रेम और भाईचारा ही राष्ट्र की असली शक्ति है।





























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