नई दिल्ली। एक अध्ययन में सामने आया है कि फेफड़ों का कैंसर धूम्रपान और वायु प्रदूषण से बढ़ रहा है। इतना ही नहीं, कुछ पारंपरिक हर्बल दवाएं भी इंसान के डीएनए को इतना नुक़सान पहुंचा रही हैं कि फेफड़ों में ट्यूमर बनना शुरू हो जाता है।
ताजा अध्ययन में जिन लोगों ने कभी सिगरेट, बीड़ी, गांजा आदि का सेवन नहीं किया, उनके फेफड़ों में भी ऐसे म्यूटेशन पाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों के ट्यूमर में यह म्यूटेशन अधिक मात्रा में मिले हैं। म्यूटेशन से तात्पर्य है डीएनए अनुक्रम (जेनेटिक कोड) में होने वाला स्थायी परिवर्तन। यह परिवर्तन कोशिकाओं के भीतर जीन की संरचना को प्रभावित करता है, जिससे प्रोटीन बनने की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो सकती है। म्यूटेशन स्वाभाविक रूप से हो सकता है या बाहरी कारकों जैसे वायु प्रदूषण, धूम्रपान, रेडिएशन या रसायनों के संपर्क से भी हो सकता है। इसकी वजह से कैंसर जैसी घातक बीमारियां भी हो सकती हैं। अध्ययन के अनुसार फेफड़ों का कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं रहा। यूनिवर्सिटी आॅफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो और नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (एनसीआई) द्वारा किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका सीधा संबंध वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय कारकों से जुड़ा है। शोध में निकले निष्कर्ष वैश्विक स्वास्थ्य नीति और शहरी नियोजन के लिए चेतावनी की घंटी की तरह हैं।
हर्बल दवाएं भी घातक
शोध में सामने आया कि ताइवान में पारंपरिक चीनी औषधियों में इस्तेमाल होने वाला एरिस्टोलोचिक एसिड भी फेफड़ों के कैंसर से जुड़ा हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन औषधियों का धुआं सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है और डीएनए को नुकसान पहुंचाता है।
भारत के लिए चिंताजनक
यह अध्ययन भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे नॉन-स्मोकर्स होते हुए भी हर दिन जानलेवा प्रदूषण में सांस ले रहे हैं। फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग नॉन-स्मोकर्स के लिए भी शुरू करने पर विचार किया जाना चाहिए।



























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