पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम स्थित त्रिशक्ति गोशाला में हर माह मनाया जाता है गोसेवा समर्पण दिवस
संकल्प शक्ति। गोपाष्टमी कार्तिक माह के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला हिंदूपर्व है। इस पर्व पर गायों और बछड़ों की पूजा की जाती है। जब कृष्ण के पिता नंद ने कृष्ण को वृंदावन की गायों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी दी थी। इस वर्ष गोपाष्टमी तिथि 29 अक्टूबर को है।
ज्ञातव्य है कि ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने हर माह पड़ने वाली शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को ‘गोसेवा समर्पण दिवस’ के रूप में मान्यता प्रदान की है। इस तरह पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम स्थित त्रिशक्ति गोशाला पर गोपाष्टमी पर्व वर्ष में एक बार नहीं, बल्कि शुक्लपक्ष की अष्टमी को हर माह उल्लास-उमंग के साथ मनाया जाता है।
गोपाष्टमी के दिन गायों की पूजा की जाती है। भक्त गोशाला जाते हैं, गायों को नहलाने के साथ ही गोशाला क ी सफाई करते हैं। इस दिन, अच्छे और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गौपूजा के साथ ही गायों की प्रदक्षिणा भी की जाती है।
भक्त दैनिक जीवन में गायों की उपयोगिता के लिए उनका विशेष सम्मान भी करते हैं। यह तो सर्वविदित है कि गाय दूध देती है, जो एक माँ की तरह लोगों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करती है। यही कारण है कि गायों को हिंदूधर्म में एक माँ के रूप में मान्यता प्राप्त है।
हिन्दूधर्म में गाय का स्थान माता के तुल्य माना जाता है और पुराणों ने भी इस बात की पुष्टि की है। भगवान् श्रीकृष्ण एवं भाई बलराम दोनों का ही बचपन गोकुल में बीता था, जो कि ग्वालो की नगरी थी। ग्वाल जो गाय पालक कहलाते है। कृष्ण एवम बलराम को भी गाय की सेवा, रक्षा आदि का प्रशिक्षण दिया गया था। गोपाष्टमी के एक दिन पूर्व इन दोनों ने गाय पालन का पूरा ज्ञान हासिल कर लिया था।
गोपाष्टमी पर्व की कथा
जब श्रीकृष्ण ने अपने जीवन के छठे वर्ष में कदम रखा, तब वे अपनी मैया यशोदा से जिद्द करने लगे कि वे अब बड़े हो गये हैं और वे गैया चराना चाहते हैं। उनके हठ के आगे मैया को हार माननी पड़ी और जिस दिन से श्रीकृष्ण के द्वारा गायों को चराने की शुरुआत की, उस दिन शुक्लपक्ष की अष्टमी थी।
इस प्रकार कार्तिक शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी मनाई जाती हैं। वृन्दावन, मथुरा और नाथद्वारा में कई दिनों पहले से इसकी तैयारी होती है। नाथद्वारा में 100 से भी अधिक गाय और उनके ग्वाले मंदिर में जाकर पूजा करते है और गायों को नहला-धुलाकर बहुत सुंदर ढंग से सजाया जाता है।




























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