संकल्प शक्ति। ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के श्रीमुख से जब ज्ञानगंगा की अमल धवल धाराएं प्रवाहित होती हैं, तो शिष्य व भक्तगण मंत्रमुग्ध, एकाग्रचित्त, मौन सुनते चले जाते है। ऋषिवर के चिन्तन की शुभ्र ज्योत्सना से जब आपके व्यक्तित्व का शतदलकमल स्वस्थ, शान्त, प्रसन्नचित्त होकर आत्ममुखी बनेगा, तो निश्चय ही आनन्द की अपूर्व अनुभूति से आप पुलक उठोगे।
सद्गुरुदेव जी महाराज का चिन्तन है कि ‘‘परमसत्ता की कृपा पर विश्वास करो, स्वयं की क्षमता पर, अपनी आन्तरिक शक्ति पर विश्वास करो और स्वाधीन बनो। किसी भी स्थिति-परिस्थिति में नशे का सहारा मत लो, क्योंकि इसका सहारा तुम्हें और अधिक कष्ट देगा। यदि नशे-मांस जैसी अपवित्र वस्तुओं का सेवन करना छोड़ दोगे, तो तुम्हारे अन्दर का पशुत्व भाव आध्यात्मिकता ग्रहण कर लेगा।
यदि माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की चेतना को अपने अन्तस में समाहित करना है, आनन्द की अनुभूति प्राप्त करना है; तो अहंकार का त्याग करना होगा, क्योंकि जब अहंकार मिटेगा, तभी तुम्हारे अन्दर समाहित हो चुकीं क्षुद्र भावनाएं तिरोहित होंगी और तब बचेगी अन्तस की पवित्रता और तभी तुम आत्ममुखी होकर ‘माँ’ की कृपा को प्राप्त कर सकोगे। भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग में परिपक्वता हासिल करो, जिससे तुम्हारी आत्मशक्ति दृढ़ हो।’’
ज्ञातव्य है कि अंतरंग योगों के महान ज्ञाता ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के द्वारा विश्व-अध्यात्म की धर्मधुरी के रूप में स्थापित अलौकिक साधनास्थली, तपोभूमि पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम की नीव 23 जनवरी 1997 को रखी गई थी और जहाँ आज सनातनधर्म को अक्षुण्यता प्राप्त हो रही है, जहां 29 वर्षों से अनवरत अनन्तकाल के लिये श्री दुगार्चालीसा का अखण्ड पाठ चल रहा है, जिससे उत्पन्न चेतनात्मक ऊर्जा से करोड़ों लोगों का अन्त:करण निर्मल हुआ है और वे सत्यधर्म की राह अंगीकार कर चुके हैं।
-कार्यकारी सम्पादक




























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