प्राय: हम तकनीक और विज्ञान के शिखर को छू रहे हैं, लेकिन जब बात अपने ‘मैं’ को, अपनी आत्मा को जानने की आती है, तो हम किंकर्त्तव्यविमूढ़ रह जाते हैं।
एक बार जगदीश नामक युवक एक आत्मज्ञानी संत के पास पहुँचा। उसके मन में कई प्रश्न थे, लेकिन उसने सबसे पहले पूँछा, ‘महाराज, आत्मज्ञान क्या है और मैं इसे कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?’ संत ने कहा, ‘बेटा, पहले तुम मुझे अपना परिचय दो, तुम कौन हो?’ युवक ने कहा, ‘मेरा नाम जगदीश है।’
संत ने कहा, ‘यह तो तुम्हारे शरीर को दिया गया नाम है। यदि तुम्हारा नाम बदल दिया जाए, तो भी तुम तो वही रहोगे। बताओ, तुम कौन हो?’ युवक थोड़ा संकुचित हुआ और बोला, ‘मैं एक शिक्षक हूँ और इस नगर के एक प्रतिष्ठित परिवार से हूँ।’ संत ने फिर शांत स्वर में कहा, ‘शिक्षक तो तुम्हारा पेशा है और परिवार तुम्हारा सामाजिक संबंध। मैं तुम्हारे पद या संबंधों के बारे में नहीं, तुम्हारे ‘मैं’ के बारे में पूछ रहा हूँ।’
युवक ने अब अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘तो फिर मैं यह शरीर हूँ, जो आपके सामने खड़ा है।’ संत ने उठते हुए कहा, ‘यह शरीर तो पंचतत्त्वों से बना है। मृत्यु के बाद यह यहीं रह जाएगा, लेकिन तुम कहते हो कि ‘मेरा’ शरीर है। जैसे यह ‘मेरा’ वस्त्र है, वैसे ही यह ‘मेरा’ शरीर है। तो फिर यह ‘मेरा’ कहने वाला ‘मैं’ कौन है?’
युवक निरुत्तर हो गया। उसे समझ में आ गया कि वह जिसे अपना परिचय समझ रहा था, वह सब बाहरी आवरण थे। वह संत के चरणों में गिर पड़ा और बोला, ‘महाराज! अब आप ही बताइए कि मैं कौन हूँ?’ संत ने उसे उठाते हुए बड़े प्रेम से कहा, ‘यही आत्मज्ञान की शुरुआत है। जब तुम यह जान लेते हो कि तुम न नाम हो, न पद, न शरीर और न ही केवल विचार, तब तुम उस ‘चेतना’ का अनुभव करते हो, जो अविनाशी है। शांत होकर अपने भीतर झांको, जहाँ विचारों का शोर थम जाता है, वहीं तुम्हारा वास्तविक स्वरूप ‘आत्मा’ निवास करती है। उसे जानना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।’
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि आत्मज्ञान बाहरी पहचान से हटकर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने की प्रक्रिया है। जिस दिन मनुष्य स्वयं को जान लेता है, उसके जीवन से भय और अज्ञान का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है।





























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