वैशाख शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि भारतीय संस्कृति में उस परम तेजस्वी अवतार प्रकाट्य दिवस है, जिन्होंने सिद्ध किया कि ईश्वर केवल कण-कण में व्याप्त ही नहीं है, बल्कि अपने भक्त की पुकार पर पत्थर के खंभे को चीरकर भी प्रकट हो सकता है। इस वर्ष 30 अप्रैल को ‘नृसिंह जयंती’ है और यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है।
कहते हैं कि दैत्यराज हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि वह न दिन में मरे न रात में, न घर के अंदर न बाहर, और न उसे कोई मनुष्य मार सके न पशु। तब ईश्वरीय शक्ति ने नृसिंह रूप धरकर, गोधूलि बेला (संध्या समय) में, हिरण्यकशिपु के महल की दहलीज पर अपने नाखूनों से उसका वध कर प्रकृति के नियमों को अक्षुण्ण रखते हुए अधर्म का अंत किया।
भक्त प्रहलाद का अटूट विश्वास
इस पर्व के केंद्र में बालक प्रहलाद की भक्ति है। भक्त प्रहलाद का चरित्र हमें सिखाता है कि यदि विश्वास अडिग हो, तो विषम परिस्थितियाँ (होलिका की अग्नि या हिरण्यकशिपु का अत्याचार) भी भक्त का बाल बांका नहीं कर सकतीं। यह दिवस हमें आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा देता है कि क्या हम अपने भीतर के ‘अहंकार रूपी हिरण्यकशिपु’ को समाप्त करने के लिए तैयार हैं?
अन्याय के विरुद्ध संघर्ष
समाज में फैल रहे भ्रष्टाचार, अन्याय और क्रूरता के विरुद्ध आवाज उठाना ही वास्तविक भक्ति है। नृसिंह अवतार का संदेश हमें यह सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए किसी भी सत्ता या शक्ति से डरने की आवश्यकता नहीं है और प्रकृति के हर अंश का सम्मान करें, क्योंकि परमात्मा हर जगह विद्यमान है।
नृसिंह जयंती हमें विश्वास दिलाती है कि जब-जब संसार में असुरत्व बढ़ेगा, तब-तब किसी-न-किसी रूप में ईश्वरीय शक्ति का उदय होगा। आवश्यकता है तो बस प्रहलाद जैसी निष्काम भक्ति और पवित्रता की, जो परमात्मा को प्रकट होने पर विवश कर दे।




























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