संकल्प शक्ति। वर्तमान युग विषमताओं का युग है और विषमताओं के बीच हमें अपने मानवीय कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए आगे बढ़ना है, तभी सभ्यसमाज की स्थापना हो सकेगी और तभी हमारा सनातनधर्म अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा तथा अन्यायी-अधर्मियों का मुंह काला होगा।
मानवसमाज को विषम परिस्थितियों से बचाने और माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की भक्ति के पुनीत मार्ग पर लोगों को अग्रसर करने के लिये ही धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने लोगों की विचारधारा में परिवर्तन करके मानवता की सेवा, सत्यधर्म की पुनसर््थापना एवं अन्यायी-अधर्मियों से देश की रक्षा करने हेतु त्रिधाराओं का सृजन किया है और वे धारायें हैं- भगवती मानव कल्याण संगठन, पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी। लक्ष्यपूर्ति की दिशा में, इन तीनों धाराओं के द्वारा जनजागरण कार्यक्रमों, रैलियों एवं शक्ति चेतना जनजागरण शिविरों के माध्यम से जहां करोड़ों घरों में ‘माँ’ की ज्योति प्रज्ज्वलित करने का पुनीत कार्य किया गया है, वहीं प्रेरणा प्राप्त करके करोड़ों लोग दुष्मार्ग से हटकर, जीवन को नष्ट करने वाली अपवित्र वस्तुओं नशा व माँसाहार को पूर्णरूपेण त्याग करते हुये चरित्रवान् जीवन जीते हुए मानवीय कर्त्तव्यों के प्रति सजग हुए हैं।
समाज को मानवीय कर्त्तव्य के प्रति पूर्णरूपेण सजग करने, सत्यधर्म के मार्ग पर बढ़ाने तथा अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध संघर्ष के लिये आत्मशक्ति प्रदान करने हेतु ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आशीर्वाद से शक्ति चेतना जनजागरण शिविरों की शृंखला में सिद्धाश्रम स्थापना पर्व पर दिनांक 22-23 जनवरी 2026 को शक्ति चेतना जनजागरण ‘योग साधना’ शिविर पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में आयोजित किया गया है, जिसमें लाखों की संख्या में नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् व चेतनावान् शक्तिसाधक व आमजन शामिल होकर अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाएंगे।
पुरुषार्थ, परोपकार, पूजा-पाठ, कीर्तन-भजन, साधना-आराधना, मानवीय कर्त्तव्य आदि धार्मिक-आध्यात्मिक कार्यों का फल अदृष्ट रहता है अर्थात् प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता है, लेकिन उसका फल हमें वर्तमान के साथ अन्य जन्मों में भी प्राप्त होता है। तात्पर्य सनातनधर्म में निर्दिष्ट मानवीय कर्त्तव्यपथ पर चलने से लौकिक एवं पारलौकिक दोनों दृष्टि में विशेष लाभ प्राप्त होता है। लौकिक दृष्टि से सात्विकता से परिपूर्ण भौतिक लाभ और अलौकिक दृष्टि से आध्यात्मिक उन्नति।
हमारे ऋषियों के द्वारा प्रणीत सिद्धान्तों का पालन करने से आध्यात्मिक लाभ तो है ही, उसके साथ भौतिक लाभ भी प्राप्त होता है। अर्थात् ऋषियों के द्वारा निर्दिष्ट सिद्धान्तों का पालन करने से आपका हर जन्म सार्थक होगा। ध्यान रखें, माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा सत्-चित-आनन्दस्वरूप हैं, हमारे सद्गुरुदेव ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज सत्-चित-आनन्दस्वरूप हैं। ‘माँ’ यही तो चाहती हैं कि हम सभी मानवीय कर्त्तव्यों का पालन करें, हमारे अन्दर शौर्य, दया, ममता, प्रेम, वात्सल्य, मधुरता, विनम्रता, सरलता, निर्भीकता व समता का प्राधान्य हो और हमारे सद्गुुरुदेव भी तो यही चाहते हैं। ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के कुछ बोधगम्य चिंतन प्रस्तुत हैं—
मानवजीवन की सार्थकता
‘‘वर्तमान में भौतिकतावाद से ग्रसित व्यक्तियों का दृष्टिकोण सत्यधर्म से हटकर अनाधिकार चेष्टाओं में रत है, जबकि मानवजीवन की सार्थकता आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति और मानवीय कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में है। लेकिन इसके लिए चित्त का संशोधन करने की ज़रूरत है। चित्त का संशोधन अनेक उपायों से करना चाहिए। ईर्ष्या-द्वेष, नशे-मांस का भक्षण, चरित्रहीनता और परनिंदा की भावनाएं ही लोगों को मानव से दानव बना रही हैं। ध्यान रखें कि आप जैसा सोचेंगे, वैसे ही बन जाएंगे।’’
अच्छे विचार ही हमें…
‘‘विद्वतजनों का संग करने, सद्साहित्य का अध्ययन करने, पवित्र वातावरण में रहने और नित्यप्रति योग-ध्यान-साधना करने से अच्छे विचार बनते हैं और अच्छे विचार ही हमें बुरे कर्मों से छुटकारा दिला सकते हैं। क्योंकि, जिसके जैसे विचार होते हैं, वह वैसे की कर्म करने के लिए प्रवृत्त होता है। अत: यदि आत्मज्ञान ग्रहण करना चाहते हो, आनन्दमय जीवन चाहते हो, तो अच्छे विचार व अच्छे कर्म की ओर प्रवृत्त होना होगा।’’
समता की स्थिति
‘‘इष्ट का प्रिय पात्र वही बन सकता है, जो व्यक्ति न तो सुख आने पर उन्मत्त होता है और न ही दु:खादि आने पर विचलित होता है। अर्थात् समता की स्थिति में रहता है। विनयी व्यक्ति का अभ्युदय होता है और जो अभिमान के मद में डूबा रहता है, उसका जीवन नर्कतुल्य होजाता है।’’
अपने शरीर को बनाएं आत्मसदृश्य
‘‘शरीर और आत्मा, ये दोनों अलग-अलग हैं। शरीर और आत्मा का परस्पर विलक्षण स्वभाव है। आत्मा सर्वविकारों से रहित परमसत्ता का सतरूप है, जबकि शरीर जड़, तुच्छ और विकारों से युक्त है। यदि आप चाहें, तो सद्कर्मों के द्वारा अपने शरीर को आत्मसदृश्य प्रकाशरूप बना सकते हैं।’’





























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