भारतीय इतिहास में 28 मई का दिन एक ऐसे महानायक की स्मृति का दिन है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता और अखंडता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें दुनिया ‘वीर सावरकर’ के नाम से जानती है, एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, समाज सुधारक, ओजस्वी वक्ता और महान विचारक थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की नींव को मज़बूत किया।
युवाओं में राष्ट्रप्रेम: सावरकर ने छात्र जीवन से ही देश की आज़ादी के लिए अलख जगाना शुरू कर दिया था। उन्होंने मित्र मेला और बाद में ‘अभिनव भारत सोसाइटी’ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी।
विदेशी कपड़ों की होली: पुणे में विदेशी कपड़ों की पहली सार्वजनिक होली जलाकर उन्होंने स्वदेशी आंदोलन को एक नई धार दी थी।
ऐतिहासिक दृष्टि
अंग्रेज़ों ने 1857 की क्रांति को केवल एक ‘सैनिक विद्रोह’ (सिपाही म्यूटिनी) कहकर दबाने का प्रयास किया था, लेकिन वीर सावरकार ने इसे प्रथम क्रान्ति निरूपित किया। सावरकर ने लंदन की इंडिया हाउस लाइब्रेरी में शोध कर ‘द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस-1857’ नामक ऐतिहासिक पुस्तक लिखी।
क्रांतिकारियों की प्रेरणा: इस पुस्तक ने साबित किया कि वह एक सोची-समझी जनक्रांति थी। ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित होने के बावजूद भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों ने इसे छपवाकर पढ़ा और फैलाया।
अमानवीय यातनाए: उन्हें काला पानी व दोहरे आजीवन कारावास की सजा दी गई। नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या के मामले में उन्हें 50 वर्ष के कठोर कारावास (काला पानी) की सजा सुनाई गई। अंडमान की सेल्युलर जेल में उन्हें कोल्हू के बैल की तरह जोता गया, भूखा रखा गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं।
छुआछूत का विरोध: रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान सावरकर ने समाज सुधार पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने जाति व्यवस्था और छुआछूत का पुरजोर विरोध किया।
पतित पावन मंदिर की स्थापना: उन्होंने सभी जातियों के लोगों के लिए ‘पतित पावन मंदिर’ का निर्माण कराया, जहां समाज के हर वर्ग को एक साथ पूजा करने और भोजन करने का अधिकार था।
प्रखर राष्ट्रवाद की अवधारणा: वीर सावरकर ने ‘हिंदुत्व’ को केवल एक पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक वृहद सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान के रूप में परिभाषित किया, जो सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक फैली भारतभूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानती है।
अखंड भारत का संकल्प: वे देश के विभाजन के घोर विरोधी थे और हमेशा सैन्य शक्ति के सुदृढ़ीकरण तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखने की वकालत करते थे।
हम यह गर्व के साथ कह सकते हैं कि वीर सावरकर का जीवन त्याग, तपस्या और अडिग देशभक्ति का एक जीवंत दस्तावेज है। देश के प्रति उनका योगदान और उनके विचार आज भी राष्ट्र निर्माण और अखंडता के मार्ग को आलोकित कर रहे हैं।





























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