काजू को सामान्यतया गरीबों की उपज और अमीरों का खाना कहा जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि काजू की पैदावार में बिचौलियों की लंबी शृंखला है। जनजातीय लोग वनोपज एकत्र करने के काम में केवल मज़दूर ही बन सकते थे, क्योंकि उनके पास इसे व्यवसायिक स्तर तक ले जाने लायक पैसा नहीं होता। इस कुचक्र को तोडऩे में तमिलनाडु के अरियालुर जि़ले में आदिवासी सहकार की नई मिसाल सामने आई है।
जि़ले के कुवागम में इरूला जनजाति के 80 परिवारों ने एक सहकारी समिति बनाई और टैफकोर्न से काजू उगाने के अधिकार हासिल किए। इन्होंने इस साल 95 बोरी काजू एकत्र करके खुले बाज़ार में बेचा और साढ़े तीन लाख रुपए का मुनाफा अर्जित किया है। इससे देश के अन्य हिस्सों में सहकारिता के आधार पर वन उपज के व्यवसायिक उपयोग का रास्ता भी प्रशस्त हुआ है।
आदिवासियों ने प्रशस्त किया सफलता का मार्ग
सफलता की यह कहानी तमिलनाडु वन विभाग, टैफकोर्न और अरियालूर जि़ला प्रशासन के प्रयासों का नतीजा है। अरियालूर कलेक्टर ने टैफकोर्न के वृद्धाचलम क्षेत्र में कुवागम इरुलार ट्राइबल सोसाइटी को 2014 कोगनार सीआरए के तहत 39.4 हेक्टेयर क्षेत्र से 2020-21 के लिए काजू एकत्र करने की सिफारिश की। पांच लाख रुपए भी स्वीकृत किए। टैफकोर्न के निदेशक मंडल ने भी सोसाइटी को काजू एकत्र करने के अधिकार दे दिए। ग्रामीणों ने अप्रैल से जून 2022 के बीच काजू एकत्र कर डीलर के जरिए प्रति बोरी साढ़े नौ हज़ार में बेचे। सोसाइटी ने कुल नौ लाख दो हज़ार पांच सौ रुपए जुटाए। इसमें काजू क्षेत्र के रखरखाव पर खर्च करीब 01 लाख 10 हज़ार और टैफकोर्न को चार लाख 42 हज़ार रुपए चुकाने के बाद भी आदिवासी समूह के पास साढ़े तीन लाख रुपये बचे। अरियालूर तमिलनाडु का सबसे ज़्यादा काजू उत्पादन करने वाला जि़ला है।




























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