संकल्प शक्ति। ऋषि-मुनियों के पावन देश भारत का सनातनधर्म केवल पूजा-पाठ का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शाश्वत दर्शन है। हज़ारों वर्षों के इतिहास में अनेक विषम परिस्थितियाँ आईं, विदेशी आक्रमण हुए और सनातन को तोड़ने का अथक प्रयास किया गया, लेकिन यह आज भी गर्व के साथ अटल रूप में विद्यमान है। यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि वह चेतना है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का आधार स्तंभ है। सनातन शब्द का अर्थ ही है वह जो नित्य है, जिसका न आदि है और न अंत। ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का चिन्तन है कि ‘‘सनातनधर्म को न आज तक कोई नष्ट कर सका है और न कोई नष्ट कर सकेगा। भले ही विघटनकारी तत्त्व कितना ही प्रयास क्यों न करें, क्योंकि यह भारत देश की जड़ में समाया हुआ है और इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे बड़ी से बड़ी ताकतें भी नहीं उखाड़ सकतीं।’’
मध्यकाल में इस्लामिक विस्तारवाद के दौरान नालंदा जैसे ज्ञान केंद्रों को जलाया गया और काशी विश्वनाथ जैसे प्रतिष्ठित मंदिरों को बार-बार नष्ट करने के प्रयास किए गए। 16वीं शताब्दी में गोवा इनक्विजिशन जैसे कालखंडों में अनेक मंदिरों को नष्ट किया गया। भारी लूट और विध्वंस के बावजूद सनातन कभी नष्ट नहीं हुआ और इसका मुख्य कारण है इसकी विकेंद्रीकृत व्यवस्था। जब एक केंद्र नष्ट होता, तो स्थानीय ज्ञान की धारा इसे पुनर्स्थापित कर देती थी।
आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक ने सनातनधर्म को जीवंत बनाने में अपनी समस्त ऊर्जा लगा दी। वर्तमान में भी कुछ विघटनकारी तत्त्व सनातनधर्म का मखौल उड़ाकर नई पीढ़ी को बरगलाने का प्रयास कर रहे हैं, कुछ स्वार्थी राजनेता और कट्टरवादी ताक़तें जातिवाद और आंतरिक भेदभाव जैसे मुद्दों का उपयोग करके हिंदू समाज को विभाजित करना चाहते हैं तथा लव जिहाद और जबरन धर्मांतरण जैसे मुद्दे भी आज सनातन की अखंडता के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।
लेकिन, उनके सामने ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज अटल खड़े हुए हैं, जिन्होंने सनातन के मौलिक मूल्यों को फिर से स्थापित करने में अपने जीवनभर की त्याग-तपस्या को अर्पित कर दिया है और उनके तेजोमय व्यक्तित्त्व के फलस्वरूप आज लाखों-लाख स्वयंसेवी भगवती मानव कल्याण संगठन के कार्यकर्ता सनातनधर्म की रक्षा के लिए प्राणप्रण से लगे हुए हैं। उन्हें भी समय-समय पर अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन वे इतने दृढ़ संकल्पित हैं कि उनके क़दमों को कोई डिगा नहीं सकता।
-अलोपी शुक्ला





























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