क्या हम कुछ ग़लत बातें सोच रहे हैं और उसका स्वयं पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसका आभास होते ही तुरंत सावधान होजाएं, क्योंकि हमारी सोच ही, हमारे विचार ही हमारे व्यक्तित्त्व को बनाते और बिगाड़ते हैं। यदि हम अच्छे विचार रखते हैं, तो प्रसन्नता की अनुभूति होगी; यदि मन में बुरे विचारों को प्रश्रय देते हैं, तो मन विचलित रहेगा; यदि भयावह विचार रखते हैं, तो आपके अन्दर एक अनजाना भय उत्पन्न होगा; अस्वस्थ विचार रखते हैं, तो आप अस्वस्थ रहेंगे और यदि असफलता का विचार रखते हैं, तो सफल नहीं हो सकते। अत: हमेशा सकारात्मक विचार रखने चाहिए, क्योंकि नकारात्मक विचार हमें पतन की ओर ले जा सकते हैं और नकारात्मक विचारों से बचने तथा मन में सकारात्मक विचारों को प्रश्रय मिले, इसके लिए हमें आत्मज्ञान की ज़रूरत है।
अपनी योगशक्ति और कर्म के बल पर पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की रचना करने वाले आत्मज्ञानप्रदाता सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का चिन्तन है कि ‘‘आत्मज्ञान की विद्या प्राप्त करने के लिए शिष्य में विवेक के साथ वैराग्य भाव होना चाहिए। वैराग्य का अर्थ यह नहीं है कि घर-परिवार को छोड़कर बाबा बन जाओ। वैराग्य का तात्पर्य है अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर लेना।’’
विवेक क्या है?: अपनी बुद्धि का सदुपयोग करना ही विवेक है और जो लोग विवेक से काम नहीं लेते, वे परनिन्दा व इन्द्रियसुख के फेर में पड़े रहते हैं, परिणामस्वरूप वे बुद्धिहीनों की श्रेणी में गिने जाते हैं। अत: इन्द्रियनियंत्रण की सहायता से विवेकप्रवृत्ति जाग्रत् करनी चाहिए और अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण विवेकवान व्यक्ति ही प्राप्त कर सकते हैं और जो लोग विवेक से काम नहीं लेते, वे असत्य को सत्य और सत्य को असत्य जानकर जीवनभर भटकते रहते हैं। अर्थात् प्रकृतिसत्ता माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा ही सत्य है, जो हमारी आत्मा की जननी हैं और शेष सबकुछ मिथ्या है, ऐसा निश्चय ही विवेक है।
वैराग्य भाव: आत्मज्ञान के लिए विवेकवान होने के साथ ही वैराग्यभाव भी होना चाहिए। अपनी इन्द्रियों को विषयों में रमण न करने देना ही वैराग्य है। बिना त्याग के वैराग्य की प्राप्ति संभव नहीं है और त्याग करना है अपने अन्दर जड़ जमा चुके राग-द्वेष, अहंकार का। इनकी निवृत्ति न होने पर आत्मज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है। अत: साधक बनें; मन विषयों में जाए ही नहीं, यही त्याग है, यही मुक्ति है, यही मोक्ष है और साधकत्त्व में ही आनन्द है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इच्छाओं पर नियंत्रण ही वैराग्य है। अत: आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए विवेक और वैराग्य भाव, इन दोनों का होना नितान्त आवश्यक है।
आत्मज्ञान के बिना: सद्गुरुदेव जी महाराज की विचारधारा को जिसने अपना लिया, वही आत्मज्ञान प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है और ऐसा न करने पर दु:ख नियति बन जाती है। गुरुवरश्री का चिन्तन है कि ‘‘तुम मूर्खतावश स्वयं को शरीररूप मानते हो तथा तृष्णा के वशीभूत होकर दु:ख पाते हो। तो यह जानना चाहिए कि हम शरीररूप नहीं, अपितु आत्मरूप हैं, आदर्शरूप हैं, जिसमें अन्तर्शक्तियाँ समाहित हैं। जैसे पुष्प में सुगन्ध होती है, अग्नि में उष्णता होती है, वैसे ही आत्मा में पवित्रता होती है। आत्मा शुद्ध-पवित्र, अजर-अमर-अविनाशी और सदा अपने आपमें स्थित है।
तुम अज्ञानता के कारण जिस ग़लत रास्ते पर चल रहे हो, उससे क्षणिक सुख तो प्राप्त कर सकते हो, लेकिन स्थाई नहीं। ग़लत मार्ग आपको पतन की गर्त में झोंक देगा। अत: इन्द्रियों को वश में करो, नशे-मांसाहार से मुक्त होजाओ, चरित्रवान् जीवन अपना लो, संयम और संतोष धारण कर लो, ज्ञानवान बन जाओ। जब ज्ञान का उदय होगा, तब अपनी आत्मा को जान पाओगे। आत्मा से बड़ी अलौकिक शक्ति और कुछ है ही नहीं। जब हम भक्ति और ज्ञान की दिशा में बढ़ते हैं, तब आत्मबल जाग्रत् होता चला जाता है। जिनके पास आत्मबल नहीं होता, वे कुछ नहीं कर सकते। आओ, सत्य का मार्ग खुला हुआ है, केवल अपनाने की ज़रूरत है।’’
वचनरूपी पुष्प…
हे ऋषिवर, हे सद्गुरुदेव! आपके ज्ञानरूप, प्रकाशरूप और रमणीय पवित्र वचन आत्मसात करके समाजहित में लिपिबद्ध करके मैं धन्य हुआ। आपके वचनरूपी पुष्प सदा खिले हुए पुष्प के समान निर्मल आनन्द प्रदान करने वाले हैं।
अलोपी शुक्ल
कार्यकारी सम्पादक: संकल्प शक्ति




























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