पुराणादि के प्रमाणिक पात्र महर्षि भृगु का जन्म लाखों वर्ष पूर्व (ब्रह्मलोक-सुषा नगर ) में वैशाखी पूर्णिमा को हुआ था। इनके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था, जिनके पुत्र बृहस्पति जी हुए, जो देवगणों के पुरोहित-देवगुरु के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि भृगु ने ज्योतिष ग्रंथ ‘भृगु संहिताÓ के रचनाकार हैं।
त्रिदेवों में श्रेष्ठ कौन?
पद्म पुराण के उपसंहार खण्ड की कथा के अनुसार, मन्दराचल पर्वत में हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-शंकर) में श्रेष्ठ देव कौन है? देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया।
त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान् शंकर के कैलाश पहुॅचे। उस समय भगवान् शंकर अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रुद्रगणों ने महर्षि को प्रवेशद्वार पर ही रोक दिया। इनके द्वारा भगवान् शंकर से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान् शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग रूप में पूजित होने का शाप दिया।
यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहा, तब महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षुभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।
भगवान् श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में सर्पाकार सुन्दर नौका (शेषनाग) पर अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ थे और उस समय वे शयन कर रहे थे। महर्षि भृगुजी को लगा कि हमें आता देख विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। उन्होंने अपने दाहिने पैर का आघात श्री विष्णु जी की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस अशिष्ट आचरण पर विष्णुप्रिया लक्ष्मी जो श्रीहरि के चरण दबा रही थी, कुपित हो उठीं, लेकिन श्रीविष्णु जी ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और कहा भगवन्! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। महर्षि भृगु लज्जित होने के साथ ही प्रसन्न भी हुए और उन्होंने श्रीहरि विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ सतोगुणी घोषित कर दिया।
त्रिदेवों की इस परीक्षा में बहुत बड़ी सीख छिपी हुई है। इस घटना से एक लोकोक्ति बनी।
”क्षमा बडऩ को चाहिए, छोटन को उत्पात।
का हरि को घट्यो गए, ज्यों भृगु मारि लात।।





























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