आयुर्वेद के अनुसार, दही खट्टी, स्वादिष्ट, पौष्टिक भूख बढ़ाने वाली, पाचनक्रिया को सही करने वाली, कब्ज को सही करने वाली, रक्त को शुद्ध करने वाली तथा यकृत को शक्ति देने वाली है।
दही का निर्माण दूध से होता है। हालांकि किसी भी पशु के दूथ से दही का निर्माण हो सकता है, परन्तु गाय के दूध से बना दही अमृततुल्य माना गया है। पशुओं में सर्वश्रेष्ठ गाय को माना गया है और हमारे वेदों में गाय को माता कहा गया है। गाय, जिसका दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर सभी उपयोग में आता है। किसी भी पूजन में इन सभी का उपयोग कर पंचगव्य का निर्माण करके प्रसाद के रूप में उपयोग करते हैं। इसी से सिद्ध हो जाता है कि गाय का दूध, दही हमारे लिए कितना उपयोगी है।
ताजा दही स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी है। इसमें दूध से भी ज़्यादा गुण पाये जाते हैं। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, कैल्सियम, जिंक, पोटैशियम, आयोडिन तथा कैलोरी ऊष्मा होती है। यह सभी तत्त्व शरीर के लिए अतिआवश्यक तत्त्व कहे जाते हैं।
दूध से ज़्यादा गुणकारी दही माना गया है, क्योंकि दूध में पानी के बाद मुख्यत: केसीन नामक प्रोटीन होता है। मगर लेक्टोबेसिलस केसी नामक वैक्टीरिया द्वारा दूध में स्थित सुगर और लेक्टोस को लेक्टिस ऐसिड में बदल देता है। यही लैक्टिस ऐसिड खट्टेपन का कारण होता है। दूध में खमीर उठती है और दूध दही में परिवर्तित हो जाता है और इसी परिवर्तन के कारण दही में अतिरिक्त गुणों का विकास होता है। जो कोलेस्ट्रोल कम करने में सहायक है।
खाना खाते समय 100 ग्राम दही प्रतिदिन लिया जाये तो इसमें मौज़ूद कैल्शियम हड्डियों के लिए अत्यन्त गुणकारी रहती है। यह शरीर की मृत कोशिकाओं की दर को घटाती है।
वैज्ञानिक अध्यनों से भी पता चला है कि चिकनाई युक्त दूध के अधिक सेवन से खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ती है, जो हृदय रोग का कारण बनती है, परन्तु दही के लगातार सेवन से कोलेस्ट्रोल कम बढ़ता है और पाचनक्रिया में दूध की अपेक्षा दही जल्दी पचता है, इस कारण भी दूध की अपेक्षा दही को अधिक लाभदायक कहा गया है।
नियमित दही में काला नमक व भुना जीरा डालकर खाने के साथ सेवन करने से पेट के सभी रोग सही रहते हैं।
प्रतिदिन दही का सेवन करने वालों का पेट साफ एवं हल्का रहता है और उन्हें अनिद्रा, दस्त, अपच, गैस और कब्ज की शिकायत नहीं रहती है।
दही का सेवन करते समय सावधानियां
* हो सके तो गाय के दूध से बना दही ही सेवन करें।
* हमेशा ताजा दही ही उपयोग करें, ज्यादा खट्टा दही नुक्रसान करता है।
* रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिए। रात्रि में दही सेवन से कफ बढऩे की शिकायत होती है।
* फाइलेरिया के रोगियों को दही नहीं खाना चाहिए।
* जिसे कफ जनित रोग रहते हो, स्नोफीलिया बढ़ा रहता है, उसे दही का सेवन नहीं करना चाहिए।
* अल्सर, रक्तपित्त, ऐसिडिटी, दस्त के साथ ज्वर, सूजन, खांसी से पीडि़त व्यक्ति दही का सेवन न करें।
* दही को एल्यूमिनियम, तांबें तथा कांसे के बर्तन में डालकर नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इन धातुओं के सम्पर्क में आने से दही ज़हरीला हो जाता है।
* दही को हमेंशा कांच, स्टील या मिट्टी के बर्तनों में डालकर ही खायें।
* किसी भी चीज की अति ही नु$कसानदायक होती है, अत: दही को भी एक सन्तुलित मात्रा में ही सेवन करें।
बृजपाल सिंह चौहान
वैद्यविशारद, आयुर्वेदरत्न




























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