पूजनीया माता जी का आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा के प्रति अटूट भक्तिभाव, तप, त्याग, संयम, पुरुषार्थ व परोपकारमय अध्यात्मिकजीवन का शुभ परिणाम रहा कि शारदीय नवरात्र पर्व 2019 की पंचमी तिथि व गुरुवार के अतिमहत्त्वपूर्ण दिवस पर युग चेतना पुरुष ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के द्वारा उन्हें संन्यास की दीक्षा प्रदान की गई। दीक्षा के साथ ही माताजी का नाम महातपस्विनी शक्तिमयी माता जी हुआ।
माताजी को बचपन से ही घर में धार्मिक-अध्यात्मिक वातावरण मिला। घर में मातेश्वरी दुर्गा जी व हनुमान जी की पूजा सामूहिक रुप से होती थी। इसका प्रभाव यह रहा कि बाल्यकाल से ही माताजी ने विधिवत नवरात्र का व्रत रहना प्रारंभ कर दिया था, लेकिन माताजी की वास्तविक अध्यात्मिक यात्रा 1984 में सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज से विवाह के पश्चात् प्रारंभ हुई।
सन् 1997 में सद्गुरुदेव जी महाराज के द्वारा ब्यौहारी, शहडोल, मध्यप्रेदश में आश्रम बनाने का संकल्प लिया गया, जो कि वर्तमान में पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम के नाम से प्रसिद्ध है। सिद्धाश्रम धाम उस समय अपने भयावह स्वरुप के कारण अँधियारी नाम से जाना जाता था। जब गुरुवरश्री अपनी बच्चियों, माताजी और कुछ शिष्यों को साथ में लेकर इस भयावह क्षेत्र में आए, तब यहाँ एक भी छायादार वृक्ष नहीं था और न समतल भूमि थी और न ही पीने के लिए स्वच्छ जल का कोई स्रोत था। ऐसे वातावरण में तिरपाल के 3-4 तम्बू व झोपड़ी बनाकर परिवार के साथ गुरुदेव जी अँधियारी क्षेत्र को आश्रम का स्वरुप देने में लग गए।
सांप-बिच्छू जैसे ज़हरीले जीव जन्तु, शीतऋतु की कड़कड़ाती ठण्ड, ग्रीष्म की तपिस एवं वर्षाऋतु में होने वाली भीषण बारिस के साथ असमायिक तूफान एवं भूत-प्रेतों की उपस्थिति जैसी विषम परिस्थितियों के बीच अपने कर्तव्य में रत माता जी के कठोर संघर्ष को देखते हुए एक दिन गुरुवरश्री ने कहा कि ‘अगर चाहो तो बच्चों को लेकर ब्यौहारी में रह सकती हो। वहाँं बच्चे पढ़ भी लेंगे और वहाँ सब सुविधाएँ भी हैं। तब माताजी ने कहा कि ‘नहीं हमें कहीं नहीं जाना, साथ रहकर हमें भी आश्रम के निर्माणकार्य में सहभागी बनना है।’ इस तरह माताजी ने आश्रम निर्माणकाल के प्रारंभिक संघर्ष को समभाव से स्वीकार किया।
सही अर्थों में कहा जाए, तो आश्रम की स्थापना के समय आश्रम के प्रारम्भिक विषम वातावरण में रहने का ठोस निर्णय ही यह दर्शाता है कि माताजी में पूर्ण वैराग्य की स्थिति थी, तथापि जीवन सहजभाव से ढलता चला गया। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि माताजी का जीवन, एक निष्काम कर्मयोगी की तरह है।
आश्रमनिर्माण के प्रारम्भिककाल में माताजी को सुबह-शाम सद्गुरुदेव जी महाराज के शिष्यों, जो आश्रमनिर्माण में सहभागी थे और आगन्तुक भक्तों के लिए भोजन बनाना पड़ता था। इतना ही नहीं, प्रारंभ हो चुके श्री दुर्गाचालीसा अखंड पाठ में लगातार 6-6 घंटे बैठकर चालीसा पाठ करना पड़ता था, क्योंकि उस समय आश्रम में सेवाकार्य करने वाले चार-पाँच लोग ही थे। हर मौसम में माताजी की सम दिनचर्या, हर धर्मनिष्ठ मनुष्य के लिए अनुकरणीय है।
माताजी का कथन है कि ”मनुष्यजीवन के मूल लक्ष्य आत्मज्ञान व पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए कर्मवान और विवेकवान होने के साथ ही मन में वैराग्यभाव भी होना चाहिए।
सर्वविदित है कि आश्रम की स्थापना से लेकर आज तक सुबह-शाम हर मौसम व हर स्थिति-परिस्थिति में माता जी के द्वारा सिद्धाश्रम स्थिति मूलध्वज में आरती का क्रम अनवरत रूप से सम्पन्न किया जा रहा है। सुबह तीन बजे उठकर सद्गुुरुदेव जी की साधनात्मक गतिविधियों से सम्बंधित साधनाकक्ष की सफाई से लेकर साधना सामग्रियों की व्यवस्था की सम्पूर्ण जि़म्मेदारी सदैव माता जी की ही रही है, जिसे पूर्ण तन्मयता से माता जी ने सदैव निभाया है और आज भी निभा रही हैं। इतना ही नहीं, माताजी के ममत्व की छाँव में सिद्धाश्रमवासियों का जीवन अतिप्रफुल्लित व कर्ममय है।
परम पूज्य गुरुवरश्री की यात्रा में घर-परिवार व समाज की हर संसारिक विषमता को अमृत समझकर पान करने वाली, तप, त्याग, संयम और ममत्व की प्रतिमूर्ति पूजनीया महातपस्विनी शक्तिमयी माताजी के श्रीचरणों में कोटिश: नमन।
संकल्प शक्ति परिवार





























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