नई दिल्ली। भारत का अपराधिक प्रणाली पहचान (क्रिमिनल प्रोसीजर आईडेन्टी, सीपीआई) अधिनियम आस्तित्व में आ गया है। इसके तहत पुलिस अधिकारियों को सात साल या उससे अधिक की जेल की सजा वाले किसी अभियुक्त या गिरफ्तार किए गए या हिरासत में लिए गए किसी व्यक्ति के बायोमेट्रिक नमूने जैसे कि अंगुलियों के निशान और आंखों का स्कैन लेने की शक्ति हासिल होगी।
इस अधिनियम के तहत जमा डाटा 75 साल तक रखा जा सकता है और दूसरी $कानूनी प्रवर्तन एजंसियों से भी साझा किया जा सकता है। डाटा जमा में बाधा डालने को अपराध करार दिया गया है। इस कानून की कड़ी आलोचना की जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि कही यह अधिनियम निगरानी राज्य न बना दे। जबकि, भारत में अभी एक व्यापक डाटा सुरक्षा प्रविधि का अभाव है।
बंदी पहचान अधिनियम 1920 की जगह यह नया $कानून लाया गया है। उस $कानून के तहत पुलिस को संदिग्धों की तस्वीर, फिंगरप्रिंट और फ्रुटप्रिंट लेने का अधिकार हासिल था। इस नए सीपीआइ एक्ट के तहत दूसरी संवेदनशील सूचनाएं भी संग्रहण के दायरे में आ गई हैं जैसे कि फिंगरप्रिंट, रेटिना स्कैन, व्यवहारजन्य कृत्य जैसे कि दस्तखत और हस्तलेख और दूसरे जीववैज्ञानिक नमूने जैसे कि डीएनए प्रोफाइलिंग।




























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