गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन, यानी भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को देश भर में ‘ऋषि पंचमी’ का व्रत और त्यौहार पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 15 सितंबर को मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में यह एकमात्र ऐसा व्रत है, जिसमें किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान और मर्यादा की राह दिखाने वाले महान ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती है।
ऋषि पंचमी का मूल उद्देश्य ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। हमारे ऋषियों ने अपने कठिन तप, शोध और ज्ञान के माध्यम से मानव सभ्यता को वेदों, उपनिषदों और आयुर्वेद का अमूल्य खजाना दिया। इस दिन पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान कर ऋषियों का तर्पण किया जाता है, जिससे मनुष्य को उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह व्रत आत्मशुद्धि, भूलवश हुए पापों के प्रायश्चित और शारीरिक शुद्धता से जुड़ा हुआ है। मान्यताओं के अनुसार, जाने-अनजाने में या दैनिक जीवन में हुए छुआछूत और रजस्वला (मासिक धर्म) के नियमों में हुई अनजानी चूकों के दोष से मुक्ति के लिए महिलाएं इस दिन विशेष रूप से व्रत रखती हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आत्मिक और मानसिक शांति के लिए जीवन में स्वच्छता और अनुशासन कितना अनिवार्य है।
सात्विक जीवन का संदेश: ऋषि पंचमी का व्रत बेहद सात्विक होता है। इस दिन व्रत रखने वाले लोग हल से जोते हुए खेतों का अन्न (जैसे गेहूं, चावल) ग्रहण नहीं करते हैं। इसके बजाय, पसई धान (तिन्नी का चावल) और कंद-मूल या बिना बोई गई सब्जियों का सात्विक आहार लिया जाता है। यह नियम हमें प्रकृति के साथ सीधे जुड़ने और सादगीपूर्ण जीवन जीने का संदेश देता है। यह त्यौहार हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और वैज्ञानिक सोच का अनूठा उदाहरण है।




























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