अगस्त की झमाझम बारिश और उमस भरे वातावरण में जब अचानक ठंडी हवाएं चलती हैं, तो सबसे पहला प्रहार हमारे गले और श्वसन तंत्र (Respiratory system) पर होता है। गले में खिचखिच, सूजन, निगलने में दर्द और छाती में कफ (बलगम) का जमना मानसून की सबसे आम समस्याएं हैं। लोग तुरंत बाजार में मिलने वाले रंग-बिरंगे ‘कफ सिरप’ पी लेते हैं, जो कफ को बाहर निकालने के बजाय छाती में ही सुखा देते हैं और नर्वस सिस्टम को सुस्त कर नींद (Drowsiness) पैदा करते हैं। आयुर्वेद ने इस जमे हुए कफ को पिघलाकर बाहर निकालने का जो सबसे सुरक्षित और ‘उष्ण’ (गर्म) अस्त्र हमारी रसोई में रखा है, वह है—’लौंग और दालचीनी का काढ़ा’।
यह कैसे काम करता है? (यूजेनॉल, सिनामाल्डिहाइड और ‘उष्ण-तीक्ष्ण’ विज्ञान)
लौंग में ‘यूजेनॉल’ (Eugenol) नामक एक अत्यंत शक्तिशाली प्राकृतिक ‘एनेस्थेटिक’ (दर्द निवारक) और ‘एंटी-बैक्टीरियल’ यौगिक होता है। वहीं, दालचीनी में ‘सिनामाल्डिहाइड’ पाया जाता है, जो शरीर के भीतर एक प्राकृतिक ‘थर्मोजेनेसिस’ (गर्मी) पैदा करता है। आयुर्वेद के अनुसार, ये दोनों मसाले ‘कटु-तिक्त’ (तीखे और कड़वे) रस वाले और तासीर में अत्यंत ‘उष्ण’ (गर्म) होते हैं। जब इनका काढ़ा (गर्म जल के साथ) पिया जाता है, तो इसकी तीक्ष्ण भाप और रस गले की सूजी हुई नसों को तुरंत सुन्न कर दर्द से राहत देते हैं। यह छाती में जमे हुए जिद्दी ‘कफ’ को मोम की तरह पिघलाकर मल और खांसी के रास्ते बाहर निकाल फेंकते हैं।
गले की सूजन, कफ वाली खांसी और सुस्त पाचन का अचूक इलाज
मानसून में भीगने या दूषित पानी पीने से जब गले में ‘टॉन्सिल्स’ सूज जाते हैं या भयंकर कफ वाली खांसी शुरू हो जाती है, तो यह काढ़ा एक जादुई एंटीबायोटिक का काम करता है। यह केवल गले को ही साफ नहीं करता, बल्कि सावन-भादों में मंद पड़ी ‘जठराग्नि’ (पाचन अग्नि) को भी भड़काकर अपच और गैस को नष्ट करता है। यह मानसून के वायरस को शरीर में टिकने नहीं देता और रक्त संचार को दुरुस्त कर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को फौलाद बना देता है।
कार्यकारी संपादक, बृजपाल सिंह चौहान (एन. डी.) नेचुरोपैथी
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