देश के बाकी तटीय राज्यों को छोड़कर मानसूनी हवाएं हमेशा केरल के रास्ते ही भारत में प्रवेश करती हैं। आखिर क्यों? भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कोई संयोग नहीं, बल्कि पृथ्वी की बनावट, समुद्र के तापमान और हवा के रुख से जुड़ा एक सटीक वैज्ञानिक घटनाक्रम है।
केरल से मानसूनी हवाओं के प्रवेश के 4 मुख्य वैज्ञानिक कारण हैं-
भूमध्य रेखा से निकटता: मानसून की शुरुआत हिंद महासागर और अरब सागर से होती है। भारत के मुख्य भूभाग में केरल भौगोलिक रूप से भूमध्य रेखा के सबसे नज़दीक स्थित है। जैसे ही समुद्र के ऊपर नमी से भरी हवाएं उत्तर की ओर बढ़ती हैं, वे सबसे पहले केरल के तट से टकराती हैं।
कोरिओलिस बल: पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण एक बल पैदा होता है, जिसे कोरिओलिस बल कहते हैं। इसकी वजह से दक्षिणी गोलार्ध से आने वाली हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही दाहिनी ओर मुड़ जाती हैं और दक्षिण-पश्चिम दिशा से सीधे केरल के तट पर प्रहार करती हैं।
पश्चिमी घाट की ऊंची दीवार: केरल की भौगोलिक बनावट में ‘पश्चिमी घाट’ की पहाड़ियां एक प्राकृतिक दीवार का काम करती हैं। जब अरब सागर से उठीं नम हवाएं इन ऊंची पहाड़ियों से टकराती हैं, तो वे ऊपर उठने को मज़बूर होजाती हैं। ऊपर जाकर यह नमी ठंडी होती है और केरल में भारी बारिश का कारण बनती है।
तापमान का अंतर: मई और जून के महीने में उत्तर और मध्य भारत की भूमि अत्यधिक गर्म होजाती है, जिससे वहां ‘लो प्रेशर’ (कम वायुदाब) का क्षेत्र बनता है। इसके विपरीत, हिंद महासागर का तापमान कम होने से वहां ‘हाई प्रेशर’ (उच्च वायुदाब) होता है। हवाएं हमेशा हाई प्रेशर से लो प्रेशर की ओर भागती हैं और इस यात्रा का पहला पड़ाव केरल तट होता है।
दो शाखाओं में बंट जाता है मानसून
केरल से टकराने के बाद भारत की भौगोलिक आकृति के कारण मानसून दो हिस्सों में विभाजित होजाता है। पहली अरब सागर की शाखा, जो मुंबई और गुजरात होते हुए मध्य भारत की ओर बढ़ती है और दूसरी बंगाल की खाड़ी की शाखा, जो म्यांमार के रास्ते भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और कोलकाता की तरफ से देश में प्रवेश करती है।




























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