आज की इस आधुनिक जीवनशैली में हम शीघ्रताशीघ्र सब कुछ जान लेना चाहते है कि अधिकाधिक धन कैसे कमाएं, कुण्डलिनी शक्ति कैसे जाग्रत् करें, ब्रह्मांड के रहस्य क्या हैं?, यहां तक कि हम दूसरों के स्वभाव से भी परिचित होना चाहते हैं, लेकिन यह सब कुछ जानने की उत्कंठा में हम ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के उस प्रश्न को भूल जाते हैं कि ‘मैं कौन हूँ?’ (कोऽहम्?)।
‘मैं कौन हूँ?’ का अर्थ स्वयं का नाम, पद या सामाजिक पहचान जानना नहीं है, अपितु यह उन परतों को हटाने की प्रक्रिया है, जो हमने समाज को दिखाने के लिए अपने ऊपर आवरण डाल रखे हैं। स्वयं का अनुभव कि ‘मैं कौन हूँ?’ यह तभी जान सकते हैं, जब शरीर, मन और अहंकार के पार हमारी दृष्टि विकसित होगी, तब जाकर उस शुद्ध चेतना का अनुभव कर सकते हैं। जैसे बादलों के हटते ही सूर्य का प्रकाश स्वत: प्रकट होजाता है, वैसे ही अज्ञानान्धकार के दूर होते ही आत्मबोध का उदय होता है। यानी आप जान जाते हैं कि वास्तव में ‘मैं कौन हूँ?’
आत्मबोध यानी कि मैं आत्मा हूँ, शरीर, नाम और पद नहीं और इस मार्ग में ‘मौन’ सबसे बड़ा साथी है। बाहरी शोर से हटकर जब हम ध्यानावस्थित होकर अपने अन्त:करण में झांकते हैं, तो हमें अहसास होता है कि हमारी अधिकांश परेशानियां हमारी अपनी ही मान्यताओं और अपेक्षाओं की उपज हैं। ध्यान और अध्यात्म (स्वयं का अध्ययन) वह दर्पण हैं, जिनमें हम अपनी आत्मा का पवित्र स्वरूप देख सकते हैं। जब व्यक्ति को अपनी आत्मा को बोध होजाता है, तो जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल जाता है और वह बाह्य परिस्थितियों में सुख नहीं ढूंढ़ता, बल्कि आंतरिक आनंद में डूब जाता है। जब हम स्वयं की चेतना को जान लेते हैं, तब हमारे मन में ईर्ष्या-द्वेष, अहंकार का कोई बोध नहीं होता और अपनत्व, प्रेम, भाईचारे का विस्तार होता है।
– अलोपी शुक्ला





























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