ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को लेकर किया गया एक नया अंतरराष्ट्रीय शोध अतिचिन्ताजनक है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ‘धरती के फेफड़े’ कहे जाने वाले वर्षावन अब तेजी से सूख रहे हैं। शोध के अनुसार, बढ़ते तापमान और कम होती बारिश के कारण दुनिया के सबसे बड़े जंगल, अमेजॉन और मध्य अफ्रीका के वर्षावनों की कार्बन सोखने की क्षमता में भारी गिरावट आई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक ये जंगल वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर धरती को ठंडा रखने में मदद करते थे, लेकिन ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित हालिया शोध के अनुसार, भीषण सूखे और बढ़ती गर्मी के कारण पेड़ों के मरने की दर बढ़ गई है। सूखते पेड़ न केवल कार्बन सोखना बंद कर रहे हैं, बल्कि सड़ने या जलने पर अपने अंदर जमे कार्बन को वापस वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। यानी जो जंगल धरती को बचा रहे थे, वे अब खुद ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने का जरिया बनते जा रहे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग का दुष्चक्र
शोधकतार्ओं ने पाया है कि पिछले तीन दशकों में अमेजॉन के जंगलों ने 30 प्रतिशत कम कार्बन सोखा है। यहाँ का तापमान औसत से 1.5 डिग्री अधिक बढ़ चुका है। मध्य अफ्रीका के वर्षावन, जो अमेजॉन की तुलना में अधिक लचीले माने जाते थे, अब वे भी सूखे की चपेट में आकर अपनी हरियाली खो रहे हैं।
मिट्टी की नमी में कमी: बढ़ते तापमान के कारण जंगलों की मिट्टी की नमी खत्म हो रही है, जिससे नए पौधों का उगना मुश्किल हो गया है।
क्या होगा असर?: अगर धरती के वर्षावन इसी रफ्तार से सूखते रहे, तो वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य नामुमकिन हो जाएगा। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने, बेमौसम बरसात और भीषण हीटवेव (लू) की घटनाएं और अधिक घातक हो जाएंगी।
विशेषज्ञों की राय: जलवायु वैज्ञानिक डॉ. थॉमस क्राउथर के अनुसार, हम केवल पेड़ लगाकर इस समस्या को हल नहीं कर सकते। नए पेड़ लगाने के साथ ही हमें मौजूदा पुराने जंगलों को बचाने पर ध्यान देना होगा। अगर ये वर्षावन पूरी तरह सूख गए, तो धरती की प्राकृतिक ऑक्सीजन सप्लाई चेन और जलवायु संतुलन पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा।
यह शोध दुनिया के लिए एक ‘रेड अलर्ट’ है। जंगलों की कटाई को तुरंत रोकना और जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कटौती करना ही अब एकमात्र रास्ता बचा है, ताकि धरती की सांसों को थमने से बचाया जा सके।





























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