हमारे भारत देश और दुनिया के तमाम साहित्य प्रेमी दिनांक 09 मई को मानवता के प्रेरणास्रोत रवीन्द्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती मनाएंगे। श्री टैगोर जी का साहित्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान है और वे केवल कवि नहीं, बल्कि एक दार्शनिक, चित्रकार, संगीतकार और शिक्षाविद् भी थे। वर्ष 1913 में उनके काव्य संग्रह ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले गैर-यूरोपीय व्यक्ति थे। भारत का राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ और बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार शोनार बांग्ला’ उन्हीं की कालजयी रचनाएँ हैं।
शांतिनिकेतन: श्री टैगोर का मानना था कि शिक्षा चार दीवारों के बीच नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में होनी चाहिए। इसी विचार को साकार करने के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल में विश्व-भारती विश्वविद्यालय (शांतिनिकेतन) की स्थापना की। आज भी वहाँ की उत्सव परंपराएं और खुले वातावरण में शिक्षा की पद्धति दुनिया के लिए एक मिसाल है। आपने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता और अंधविश्वासों पर कड़ा प्रहार किया। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी थी, जो उनके राष्ट्रप्रेम का ज्वलंत उदाहरण है।
आज के समय में प्रासंगिकता: श्री टैगोर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने एक सदी पहले थे। उनका प्रसिद्ध वाक्य, ‘जहाँ मन भयमुक्त हो और मस्तक ऊंचा रहे’आज भी हमें एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र के निर्माण की प्रेरणा देता है।




























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