गर्मियों में जब पसीना बहुत आता है और जठराग्नि (पाचन की आग) कमजोर हो जाती है, तो हमें भारी भोजन पचता नहीं है। ऐसे समय में दही से ज्यादा फायदेमंद ‘छाछ’ या ‘मट्ठा’ (Buttermilk) होता है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा में छाछ को ‘धरती का अमृत’ कहा गया है। यह पेट के लिए एक प्राकृतिक ‘प्रोबायोटिक’ (Probiotic) है, जो हमारी आंतों में अच्छे बैक्टीरिया (Good Bacteria) की संख्या को बढ़ाता है।
दही और छाछ में क्या अंतर है?
अक्सर लोग सोचते हैं कि दही और छाछ एक ही हैं, लेकिन दोनों की तासीर में बहुत बड़ा अंतर है। दही पचने में भारी होता है और कफ बढ़ाता है। लेकिन जब दही में पानी मिलाकर उसे मथनी (Wooden Churner) से मथा जाता है और उसका मक्खन निकाल लिया जाता है, तो वह ‘छाछ’ बन जाता है। मथने की प्रक्रिया से इसकी तासीर हल्की और सुपाच्य हो जाती है। यह पेट की गर्मी, गैस और एसिडिटी को स्पंज की तरह सोख लेता है।
पाचन तंत्र की संपूर्ण सर्विसिंग
दोपहर के भोजन (Lunch) के बाद एक गिलास ताजी छाछ पीना भोजन को अमृत बना देता है। यह आंतों की अंदरूनी परत को चिकनाई देता है और कब्ज को जड़ से खत्म करता है। इसमें मौजूद कैल्शियम और विटामिन्स शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और डिहाइड्रेशन से बचाते हैं।
कार्यकारी संपादक, बृजपाल सिंह चौहान (एन. डी.) नेचुरोपैथी





























Views Today : 35
Views Last 7 days : 262
Views Last 30 days : 1302
Views This Year : 7064
Total views : 107537
Who's Online : 0
Your IP Address : 216.73.217.31