अपने जीवन में आई विषमताओं के कारण मोहन बहुत अशांत रहता था और उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? शांति पाने के लिए वह इधर-उधर भटक रहा था। तब, किसी ने उसे सुझाव दिया कि पड़ोसी गांव में एक पहुंचे हुए साधु आए हुए हैं, वे कोई-न-कोई राह अवश्य दिखाएंगे। मोहन उस साधु के पास गया और उनसे कहा,‘महाराज, मेरा मन बहुत अशांत है, भागदौड़ से मैं परेशान हो चुका हूँ और दुखों ने मुझे घेर रखा है। आखिर मुझे शांति कब और कहाँ मिलेगी?’
साधु ने उसे एक प्रज्ज्वलित दीपक देकर कहा कि ‘इस दीपक को लेकर समीप ही स्थित पहाड़ी गुफा में जाओ और उस गुफा में वह स्थान ढूंढो, जहाँ सबसे ज़्यादा अंधेरा हो।’ मोहन दीपक लेकर गुफा में गया, लेकिन क्या देखता है कि वह दीपक लेकर जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ का अंधेरा अपने आप दूर होजाता है। उसने उस गुफा के हर कोने में जाकर देखा, लेकिन उसे कहीं भी अंधेरा नहीं मिला। आखिरकार वह गुफा से बाहर निकल आया और साधु महाराज के पास जाकर बोला, ‘महाराज, मुझे कहीं अंधेरा मिला ही नहीं। मैं जिस कोने में भी गया, वहाँ प्रकाश फैल गया।’
साधु ने मीठी आवाज़ में समझाते हुए कहा, ‘ठीक इसी तरह तुम्हारा जीवन है। तुम शांति को बाहर की वस्तुओं में तलाश रहे हो, जबकि शांति तुम्हारे भीतर ही है, केवल ज़ागरूक होने की ज़रूरत है। जिस तरह दीपक के रहते अंधेरा नहीं टिक सकता, उसी तरह यदि तुम्हारे भीतर सकारात्मक विचार और संतोष का प्रकाश है, तो बाहरी दु:ख और अशांति तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर सकते।’





























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