पुरी की जगन्नाथ यात्रा भारत की सबसे पवित्र धार्मिक यात्राओं में से एक है, जो हर साल आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होकर दशमी तिथि तक चलती है। इस बार यह यात्रा 27 जून से शुरू होकर 05 जुलाई को समाप्त होगी। लोगों का मानना है कि इस यात्रा में शामिल होना और भगवान् जगन्नाथ के दर्शन करने से जीवन के सभी दु:ख और परेशानियां दूर होजाती हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मान्यता है कि भगवान् जगन्नाथ अपनी इस यात्रा पर निकलने से पहले अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ 14 दिनों का एकांतवास करते हैं। इसके बाद शुक्लपक्ष की द्वितीय तिथि को वे भक्तों को दर्शन देते हैं और रथ यात्रा की शुरूआत होती है। यह परंपरा भक्तों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, जो अध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि का संदेश देती है।
पौराणिक कथा
जगन्नाथ रथ यात्रा के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो पद्म पुराण में वर्णित है। कहा जाता है कि आषाढ़ महीने में भगवान् जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे शहर देखने की इच्छा जताई थी। तब भगवान् जगन्नाथ ने अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिए तीन रथ बनवाए। तीनों भाई-बहन उन रथों पर बैठकर नगर भ्रमण पर निकले और अपनी मौसी के घर, जिसे गुंडिचा मंदिर कहा जाता है, वहां सात दिन तक रहे। इस घटना के बाद से ही हर साल यह रथ यात्रा निकाली जाने लगी। इस रथ यात्रा में सबसे आगे भगवान् बलराम का रथ होता है, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान् जगन्नाथ का रथ होता है।
यात्रा के दौरान भक्तजन भगवान् की रथों को अपने हाथों से खींचते हैं, जिससे यह विश्वास जुड़ा है कि ऐसा करने से उनके सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें जीवन में सुख-शांति प्राप्त होती है। इसलिए यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास, भक्ति और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है।





























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