ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि (22 जून) को तंत्र शास्त्र की सर्वोपरि अधिष्ठात्री देवी, दस महाविद्याओं में सातवीं शक्ति माता धूमावती जी की जयंती मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार, इसी पावन तिथि को संहारक शिव की शक्ति मां धूमावती का प्राकट्य हुआ था। इस विशेष पर्व पर दतिया के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां पीतांबरा पीठ सहित देश के तमाम तंत्र साधना केंद्रों पर विशेष अनुष्ठान और गुप्त आराधना की जाएगी।
यह दिन तंत्र साधकों, अघोरियों और देवी भक्तों के लिए आत्मिक शुद्धि और सांसारिक कष्टों से मुक्ति पाने का एक महाअवसर होता है। दस महाविद्याओं में केवल मां धूमावती ही ऐसी शक्ति हैं, जो अमंगलकारी और उग्र स्वरूप में पूजी जाती हैं। देवी का यह स्वरूप अत्यंत विलक्षण और वैराग्य से ओतप्रोत है। शास्त्रों के अनुसार, माता धूमावती वृद्धावस्था के रूप में श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके बाल बिखरे हुए हैं, वाहन कौआ (काक) है और वे एक बिना सारथी वाले रथ पर सवार हैं। उनके एक हाथ में सूप (अनाज फटकने वाला) है और दूसरा हाथ वरदमुद्रा में रहता है। देवी का यह स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि संसार में जो कुछ भी नष्ट होने योग्य या नश्वर है, वह अंतत: धूमावती में विलीन होजाता है।
माता धूमावती के प्राकट्य की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी पार्वती को तीव्र भूख लगी। उन्होंने भगवान् शिव से भोजन की याचना की। महादेव ने उनसे कुछ समय प्रतीक्षा करने को कहा और ध्यानमग्न होगए। भूख की तड़प से व्याकुल होकर माता पार्वती ने अपनी क्षुधा शांत करने के लिए स्वयं भगवान् शिव को ही निगल लिया। शिव जी के गले में मौजूद विष के प्रभाव से देवी का शरीर धुएं (धूम्र) से भर गया और वे विधवा स्वरूप में आ गईं। तब महादेव ने उनके शरीर से बाहर आकर कहा कि ‘‘चूंकि तुमने भूख के वशीभूत होकर अपने ही पति को निगल लिया, इसलिए अब से तुम संसार में ‘धूमावती’ और ‘दरिद्र प्रपंचा’ के नाम से जानी जाओगी।’’ यह स्वरूप देवी के संहार और शून्यता की शक्ति को प्रदर्शित करता है।
सुहागिनों के लिए मां धूमावती की साधना वर्जित
मां धूमावती की पूजा-साधना के नियम अत्यंत कठिन और विशिष्ट हैं। धार्मिक मान्यताओं और परंपरा के अनुसार, सुहागिन महिलाओं के लिए मां धूमावती की मूर्ति का स्पर्श करना या उनकी सीधी पूजा करना वर्जित माना गया है। महिलाएं केवल दूर से ही माता के दर्शन कर सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि माता का स्वरूप चूंकि पूर्ण वैराग्य और सुहाग विहीनता का प्रतीक है, इसलिए सुहागिनों को उनकी साधना से दूर रहना चाहिए। केवल पुरुष साधक ही माता की गुप्त आराधना करते हैं।
विजय प्राप्ति के लिए अमोघ साधना
भले ही माता का स्वरूप उग्र और डरावना प्रतीत होता है, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे अत्यंत कृपालु हैं। ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी के दिन जो भी साधक पूरी निष्ठा से माता की आराधना करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, रोग, शोक और शत्रुओं का समूल नाश होजाता है।
आइए, इस जयंती पर हम सब माता धूमावती का स्मरण कर जीवन के समस्त अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने की प्रार्थना करें।




























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