हमारा देश धार्मिक एवं राष्ट्रीय त्यौहारों के उत्सव का देश है और हर त्यौहार के पीछे कोई-न-कोई गहरा अर्थ छिपा हुआ है। होली पर्व भी सत्य और भक्ति की विजय का प्रतीक है। होलिका दहन कार्यक्रम फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात को मनाया जाता है। यह रंगभरी होली से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है, जिसे हम बड़े ही उल्लास-उमंग के साथ मनाते हैं।
पौराणिक पृष्ठभूमि
होलिका दहन की कथा सतयुग से सम्बद्ध है। असुरों का राजा हिरण्यकश्यप इतना अहंकारी था कि स्वयं को ईश्वर कहता था और वह चाहता था कि पूरी सृष्टि केवल उसकी पूजा करे, लेकिन उसका पुत्र प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने के अनेक प्रयास किए, लेकिन हर बार भगवान् ने उसकी रक्षा की। अंत में, राजा ने अपनी बहन होलिका की मदद ली। होलिका को ब्रह्मा जी से एक वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। अपने भाई के आदेश पर होलिका, प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर धधकती चिता पर बैठ गई। परंतु, ऐसा चमत्कार हुआ कि प्रहलाद सुरक्षित बच गए और वरदान का दुरुपयोाग करने के कारण होलिका जलकर राख हो गई। तभी से यह दिन बुराई के अंत के रूप में मनाया जाता है।
इस पर्व का वैज्ञानिक एवं सामाजिक महत्त्व भी है। यह त्यौहार वसंतऋतु के आगमन और शीतऋतु की विदाई के समय आता है और होलिका दहन के रूप में लकड़ियाँ और औषधीय चीजें जलाई जाती हैं, जिससे वातावरण में मौजूद कीटाणु नष्ट होते हैं, जो कि स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है।
इस पर्व के आगमन पर लोग अपने घरों की अच्छी तरह सफाई करते हैं, जिससे घर का वातावरण भी स्वच्छ बनता है। इतना ही नहीं, इस पर्व पर पूरा समाज जातपात का भेदभाव मिटाकर एक-दूसरे को गले लगाते है, एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं, जिससे भाई-चारा बढ़ता है।
वर्तमान में पर्व की प्रासंगिकता
होलिका दहन हमें यह संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, वह सत्य और ईश्वर की शक्ति के सामने टिक नहीं सकती। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें अपने भीतर की बुराइयों—जैसे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या-द्वेष और अहंकार को जलाकर अपने जीवन को प्रेम के रंग से आप्यायित रखना चाहिए।





























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