ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के द्वारा अपने शिष्यों-भक्तों को परमसत्ता माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा के श्रीचरणों पर ध्यान लगाने, ध्यान की चरमावस्था पर पहुंचने के लिए ऐसी विधि का ज्ञान प्रदान किया गया है, जिसे अपनाने से आप शीघ्र ही अपने मन पर पकड़ हासिल कर सकते हैं।
पहले यह समझना आवश्यक है कि ध्यान क्या है? भौतिक जगत् के झंझावातों को मन से विस्मृत करके ऋषिवर के द्वारा प्रदत्त गुरुमंत्र, चेतनामंत्र तथा बीजमंत्र-‘माँ’-ॐ का उच्चारण करते-करते मौन हो जाएं। धीरे-धीरे मस्तिष्क शून्य में विचरण करने लगेगा और यही ध्यान है, यही ध्यान की चरमावस्था है।
सद्गुरुदेव जी महाराज का कथन है कि ‘‘किसी एकान्त व शान्त स्थान पर आसन बिछाकर पद्मासन या सुखासन लगाकर बैठ जाओ। मेरुदण्ड (रीढ़, कमर और पीठ को) सीधी रखो और अपने दोनों हाथों को गोद में रखो अथवा दोनों हाथों को पैर के घुटनों पर रखकर ध्यानमुद्रा बना लें। इसके बाद अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर स्थिर करते हुए शरीर को ढीला छोड़ दो और चेतनामंत्र ‘ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नम:’ अथवा बीजमंत्र-‘माँ-ॐ’ का उच्चारण करते-करते एक समय ऐसी स्थिति निर्मित होगी कि तुम्हारा मन धीरे-धीरे शान्त होता चला जायेगा। उस समय ऐसा प्रतीत होगा कि तुम्हारे अंग-अंग में, रोम-रोम में शान्ति का झरना प्रवाहित है। इस अवस्था में अपने चित्त को स्थिर किए रहें, क्योंकि इस अवस्था में एक बार पुन: बाह्य विचार आक्रमण करेंगे, जिन्हें हावी नहीं होने देना है। प्रयत्न जारी रखें, अन्तत: विजय की प्राप्ति होगी और तुम्हारा मनमस्तिष्क शून्य में, शांतिकुज में विचरण करने लगेगा। यही ध्यान की चरम अवस्था है और यहीं से तुम्हारी अध्यात्म की पारलौकिक यात्रा प्रारम्भ होती है।’’
मानवजीवन का सत्य है-अध्यात्म, अध्यात्मिक चेतना, सार्वभौमिक पारलौकिकता और ध्यान की चरम अवस्था को प्राप्त करके ही हम कर पाएंगे स्वयं की आत्मा का अध्ययन; जो निर्वाक है, मौन है। यह वह रहस्यमयीशक्ति है, जिसे जिसने कुत्सित आवरण से परे कर लिया, उसने सत्य को पहचान लिया।
हमेशा ध्यान रखें कि हमें इन्द्रियों के उथलेपन से ऊपर उठना है। हमारी इन्द्रियां सदैव आत्मा के विरुद्ध कार्य करने के लिए विवश करती हैं, प्रकाश से अंधकार की ओर, ज्ञान से अज्ञान की ओर लेजाने वाले विचार हर समय उत्पन्न होते रहते हैं। अत: हर पल सतर्क रहने की आवश्यकता है। यदि किसी भी पल आपकी इन्द्रियां आपको बुरे विचारों की ओर ले जाने लगें, बुरे कार्य के प्रति उद्वेलित करने लगें, तो तत्काल सचेत होजाएं।
ध्यान-साधना के द्वारा ही हम शान्ति और सन्तोष प्राप्त कर सकते हैं, तनाव से मुक्त हो सकते हैं। किसी भी स्थिति-परिस्थिति में नशे का सहारा मत लें, क्योंकि इसका सहारा आपको और अधिक कष्ट देगा। स्वयं पर विश्वास करें कि मैं अजेय हूँ। यदि नशे-मांस जैसी अपवित्र वस्तुओं का सेवन करना छोड़ दोगे, तो आपके अन्दर का पशुत्व मनुष्यत्त्व में परिवर्तित होकर आध्यात्मिकता ग्रहण कर लेगा। अपने चरित्र को समुज्वल बनाएं और आत्मा के अमरत्त्व का चिन्तन करें तथा कर्म की प्रधानता के महत्त्व को समझें। जब अपने हृदय में सत्यधर्म को पूर्णरूपेण स्थापित कर लेंगे, तब अभाव, दु:ख-दर्द और मृत्यु से कभी भयभीत नहीं होंगे। अतएव नशा-मांसाहार, दुश्चरित्रता, काम, क्रोध, लोभ, भय, अहंकार जैसी पशुप्रवृत्तियों को त्याग करके साहसी बनो, शक्तिशाली बनो।
ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का कथन है कि ‘‘सत्यधर्म का जीवन शिरोधार्य करो। निश्चय ही सत्यधर्म का रास्ता कठिन और लम्बा है, लेकिन आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से लगातार विचार करने पर इस कठिन और लम्बे रास्ते को सहज ही तय किया जा सकता है। जब तक आपका सम्पूर्ण स्वभाव साधनामय नहीं होजाता, तब तक अपने विचारों को सही दिशा देते रहें। विचारमंथन से यह निष्कर्ष निकलेगा कि माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा ने हमारे अंदर अतुलित शक्तियों को समाहित किया है, लेकिन हम अपने कुत्सित आचरणों से अपनी विशेषताओं और अन्तर्निहित शक्तियों को नष्ट करते जा रहे हैं।’’
सद्गुरुदेव जी महाराज का चिन्तन है कि ‘‘पूर्णरूपेण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त और चरित्रवान् जीवन अपनाकर मानवता की सेवा, धर्मरक्षा एवं राष्ट्र की रक्षा के कर्तव्य की प्रतिपूर्ति का पुण्य ही हमारी अजर-अमर-अविनाशी जीवात्मा में समाविष्ट होकर जन्म-जन्मांतर तक साथ देगा और हमारा हर जन्म प्रकाशमय होगा। तो फिर इस नाशवान स्थूल शरीर के प्रति इतना मोह क्यों? दूसरों के प्रति ईर्ष्या-द्वेष क्यों? अहंकार किस बात का? अपने शरीर को क्यों बना डाला है विषय-विकारों की प्रतिपूर्ति का माध्यम? क्यों नहीं अच्छे से अच्छे कार्यों में इस स्थूल का, इस शरीर का उपयोग कर रहे हो?’’
ऋषिवर के उपदेशों का अक्षरश: पालन करें। अच्छी बातें जानकर उनका पालन न करना और बुरी बातें जानकर उनका त्याग न करना आपके पतन का मुख्य कारण है। हमारे अन्दर ईर्ष्या-द्वेष, अहंकार, भय-शोक, विषय-विकार उत्पन्न होते रहते हैं। आख़िर ये क्यों उत्पन्न होते हैं? प्राय: यह समझा जाता है कि इसका कारण प्रारब्ध है, लेकिन ऐसा नहीं है। इनकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है। – अलोपी शुक्ल




























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