सनातन परंपरा में देवर्षि नारद भगवान् विष्णु के अनन्य भक्त तो थे ही, उन्हें सृष्टि का प्रथम पत्रकार भी माना जाता है। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि को उनकी जयंती मनाई जाती है, जो इस वर्ष 03 मई को पड़ रही है।
पुराणों के अनुसार, नारद मुनि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। उन्हें तीनों लोकों (आकाश, पाताल और पृथ्वी) में निर्बाध विचरण करने की शक्ति प्राप्त है। उनके हाथ में ‘महती’ नाम की वीणा और मुख पर ‘नारायण-नारायण’ का जाप रहता है। वे देवताओं और असुरों, दोनों के बीच समान रूप से आदरणीय हैं, क्योंकि उनके प्रत्येक संवाद के मूल में ‘लोक-कल्याण’ की भावना छिपी होती है।
आधुनिक युग में नारद जी को पत्रकारिता का प्रेरणा स्रोत माना जाता है। उनके संचार के तीन मुख्य आधार थे- गति, सत्यता और लोकहित। उनके द्वारा दी गई सूचनाओं ने रामायण और महाभारत जैसी घटनाओं को सही दिशा प्रदान की।
ज्ञान का विस्तार
महर्षि नारद ने ही वाल्मीकि जी को रामायण लिखने की प्रेरणा दी और महर्षि व्यास को भागवत की रचना का मार्ग दिखाया।
भक्ति और दर्शन के प्रणेता
नारद जी केवल संदेशवाहक नहीं, बल्कि महान दार्शनिक भी थे। उनके द्वारा रचित ‘नारद भक्ति सूत्र’ आज भी भक्ति मार्ग का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने भक्त प्रह्लाद और ध्रुव जैसे महान चरित्रों को भक्ति का मार्ग दिखाकर उन्हें अमर बना दिया।
वर्तमान में प्रासंगिकता
आज के इस कथित आधुनिक युग में, जहाँ भ्रामक सूचनाओं की भरमार है, वहीं महर्षि नारद का आदर्श अत्यंत प्रासंगिक है। उनका जीवन हमें यह सीख देता है कि सूचना का उद्देश्य विवाद पैदा करना नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाना और समाज का कल्याण करना होना चाहिए। उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि ज्ञान और सूचना का उपयोग समाज को जोड़ने के लिए होना चाहिए। तथापि, उनके आदर्शों को अपनाकर ही एक जागरूक और नैतिक समाज की स्थापना की जा सकती है।





























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