संकल्प शक्ति। सावन का महीना हमारे सनातन संस्कृति में आत्मिक शुद्धि, प्रकृति से जुड़ाव और देवाधिदेव महादेव की आराधना का सबसे पावन काल माना जाता है। इस वर्ष 24 अगस्त को उत्तर भारत के हिंदू कैलेंडर के अनुसार चतुर्थ और अंतिम श्रावण सोमवार है। यह दिन सावन के पूरे महीने चली कठिन साधना, उपवास और कांवड़ यात्राओं के समापन की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
चतुर्थ सोमवार का धार्मिक महत्त्व
शास्त्रों में सावन के आखिरी सोमवार को ‘पूर्णता का प्रतीक’ माना गया है। मान्यता है कि जिन्होंने पूरे महीने व्रत नहीं रखा, यदि वे इस अंतिम सोमवार को पूर्ण निष्ठा से शिव-पार्वती की पूजा करते हैं, तो उन्हें पूरे सावन मास की पूजा का फल प्राप्त होता है।
समसामयिक परिप्रेक्ष्य
आज के आधुनिक दौर में सावन का यह अंतिम सोमवार केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का एक बड़ा पाठ है।
पर्यावरण का संरक्षण
सावन का महीना प्रकृति के सबसे सुंदर रूप यानी ‘हरियाली’ का उत्सव है। शिवजी को चढ़ाई जाने वाली सामग्री (जैसे बेलपत्र, दूर्वा, जल) हमें प्रकृति के करीब लाती है। यह दिन हमें जल संरक्षण और वृक्षारोपण का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
सहनशीलता और मानसिक शांति
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तनाव के बीच शिव का ‘ध्यान मग्न’ स्वरूप हमें मानसिक स्थिरता सिखाता है। समुद्र मंथन के दौरान विष पीकर ‘नीलकंठ’ कहलाने वाले शिव हमें सिखाते हैं कि समाज की कड़वाहट और नकारात्मकता को पचाकर कैसे लोक-कल्याण (सद्भाव) का मार्ग चुना जाता है।
शिवत्व को आत्मसात करने का दिन
सावन का आखिरी सोमवार महादेव से दूर होने का दिन नहीं है, बल्कि उनके ‘शिवत्व’ (कल्याणकारी गुण) को अपने भीतर स्थापित करने का दिन है। पूजा और उपवास की सार्थकता तभी है जब हम अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध का विसर्जन करें।




























Views Today : 26
Views Last 7 days : 201
Views Last 30 days : 673
Views This Year : 9234
Total views : 109707
Who's Online : 0
Your IP Address : 162.251.85.8