नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने न्यूरोटेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तालमेल से एक ऐसी सफलता हासिल की है, जिसके बाद अब इंसानी दिमाग की तरंगों से कंप्यूटर और व्हीलचेयर को सीधे नियंत्रित किया जा सकेगा। ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस नामक इस तकनीक के आने से लकवा, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी या रीढ़ की हड्डी की चोट से जूझ रहे दुनिया के करोड़ों दिव्यांग और लाचार मरीजों को स्वतंत्र जीवन जीने की एक नई उम्मीद मिल गई है।
कैसे काम करता है यह सिस्टम? इस तकनीक में मरीज के सिर पर एक विशेष इलेक्ट्रोड कैप पहनाई जाती है या एक छोटी वायरलेस चिप लगाई जाती है। जब व्यक्ति किसी दिशा में चलने या स्क्रीन पर कुछ लिखने के बारे में ‘सोचता’ है, तो दिमाग के न्यूरॉन्स में विशेष विद्युत तरंगें पैदा होती हैं। व्हीलचेयर और कंप्यूटर में लगा एडवांस एआई प्रोसेसर इन दिमागी सिग्नलों को तुरंत डीकोड करता है और उसे मशीन की भाषा (कमांड) में बदल देता है।




























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