त्रेता युग में फाल्गुन माह की कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि को वनवास के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम की शबरी से भेंट हुई थी और श्रीराम के आशीर्वाद से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। माता शबरी को श्री राम की अनन्य भक्ति के लिए सम्पूर्ण सृष्टि में जाना जाता है। माता शबरी का जन्म भील समुदाय की शबर जाति में हुआ था। उनकी माता का नाम इन्दुमति और पिता का नाम अज था। शबरी के पिता भील समुदाय के एक कबीले के प्रमुख थे।
माता शबरी के बचपन का नाम श्रमणा था, लेकिन शबर जाति से होने के कारण उन्हें शबरी के नाम से भी जाना जाने लगा। शबरी का बचपन से ही वैराग्य के प्रति रुझान था। राजा अज एवं भील रानी इन्दुमति, उनके इस व्यवहार से परेशान थे। इसलिए उन्होंने शबरी का विवाह कराने का निश्चय किया।
एक दिन शबरी ने जब अपने घर के बाड़े में अनेक पशु-पक्षियों को देखा, तो अपनी मां से उन पशु-पक्षियों के वहां होने का कारण पूछा। माता इन्दुमति ने कहा ‘इन सभी पशु-पक्षियों से तुम्हारे विवाह का भोजन तैयार किया जायेगा। यह सुनकर शबरी को बड़ा दु:ख हुआ और उन्होंने मन ही मन विवाह नहीं करने का निश्चय किया।
एक रात शबरी ने सभी के सो जाने के बाद बाड़े के किबाड़ खोल दिये और सभी पशु-पक्षियों को रिहा कर दिया। ऐसा करते हुए श्रमणा को किसी ने देख लिया, जिससे भयभीत होकर शबरी वहां से भागकर ऋष्यमूक पर्वत पर चली गयीं। जहां हजारों ऋषिगण निवास करते थे।
मातंग ऋषि ने अपनी पुत्री के रूप में अपनाया
शबरी गुप्त रूप से उस पर्वत पर निवास करने लगीं। वह प्रतिदिन ऋषियों की कुटिया के बाहर झाड़ू लगाकर हवन के लिए लकड़ियां चुनकर लातीं, लेकिन उन्हें ऐसा करते हुए कभी किसी ने देखा नहीं था। एक दिन भोर में ऋषिगणों ने शबरी को देख लिया और उससे परिचय पूछा। माता शबरी ने ऋषिगणों को अपना परिचय दिया। जिसके बाद मातंग ऋषि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया और अपने आश्रम ले गए।
गुरु के वचनों का किया पालन
जब मातंग ऋषि का अन्तिम समय निकट आया तो माता शबरी बहुत दु:खी होकर बोलीं कि ‘एक पिता को मैं छोड़ कर आयी थी और अब मेरे दूसरे पिता मुझे छोड़ कर जा रहे हैं। मेरे जीवन का क्या उद्देश्य रहे जायेगा?’ तब मातंग ऋषि ने उन्हें भगवान् श्रीराम के विषय में बताया और उनकी प्रतीक्षा करने को कहा।
माता शबरी ने अपने पिता तुल्य गुरु के वचनों का पालन करते हुए भगवान् श्रीराम के नाम अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। वह नित्य-प्रतिदिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा में मार्ग को बुहारा करतीं। उनके लिये वन से मीठे-मीठे फल चखकर लाती थीं।
भगवान् श्रीराम अनुज लक्ष्मण जी के साथ शबरी की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर अपने वनवासकाल के समय शबरी की कुटिया पर पहुंचे। इसके साथ ही प्रेमपूर्वक उनके जूठे बेरों का सेवन कर उनका उद्धार किया। माता शबरी का जीवन अपने आराध्य के प्रति अगाध भक्ति, गुरुनिष्ठा, दया, तप एवं विश्वास का जीवन्त उदाहरण है।





























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