भैरव अष्टमी, जिसे भैरवाष्टमी, भैरव जयंती, काल-भैरव अष्टमी और काल-भैरव जयंती के रूप में भी जाना जाता है, यह हिंदू धर्म का पवित्र दिन है। इस दिन को भैरव जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह कार्तिक के हिंदू महीने के पंद्रहवें दिन (अष्टमी) को घटते चंद्रमा (कृष्णपक्ष) के पखवाड़े में पड़ता है। भैरव, भगवान् शिव के क्रोधरूपी अवतार हैं।
शक्ति साधना दिवस
ज्ञातव्य है कि हर माह पड़ने वाली कृष्णपक्ष की अष्टमी को ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने शक्ति साधना दिवस घोषित किया है और इस दिन ऋषिवर के लाखों शिष्य व्रत रहकर आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा सहित सभी सहायक शक्तियों की आराधना करते हैं और इस दिन को पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में भक्ति से परिपूर्ण वातावरण में हर्षोल्लापूर्वक मनाया जाता है तथा सायंकालीन आरतीक्रम व परम पूज्य गुरुवरश्री को प्रणाम करके शिष्य व भक्तगण प्रसादरूप में गाय के शुद्ध घी से निर्मित हलुआ प्राप्त करते हैं।
कालभैरव जयंती का महत्त्व
कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान् शिव के भयंकर रूप कालभैरव के अवतरण दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान् कालभैरव की पूजा करने से कुंडली के ‘राहु’ और ‘शनि’ दोष समाप्त होजाते हैं और भक्तों को अच्छा स्वास्थ्य, सफलता और सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ‘ॐ भ्रं भैरवाय नम:।’





























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