भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में विनायक दामोदर सावरकर को एक ऐसे सेनानी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने न केवल अंग्रेज़ों की सत्ता को हिलाने के साथ ‘हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ की विचारधारा को एक नई दिशा दी। उनकी पुण्यतिथि 26 फ़रवरी पर समूचा भारत देश की अस्मिता की रक्षा के प्रति उनके बलिदान को नमन करता है। वीर सावरकर जी के जीवनचरित से युवाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए।
विनायक दामोदर सावरकर के हृदय में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। उन्होंने ‘मित्र मेला’ और बाद में ‘अभिनव भारत’ जैसी गुप्त संस्थाओं की स्थापना की, जिसका एकमात्र ध्येय सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना था। लंदन में शिक्षा के दौरान उन्होंने भारतीय छात्रों को एकता के सूत्र में पिरोया और ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक एक कालजयी पुस्तक लिखी, जिसने 1857 के विद्रोह को ‘गदर’ की जगह भारत का ‘पहला स्वतंत्रता संग्राम’ सिद्ध किया।
ब्रिटिश सरकार ने दीं घोर यातनाएं
वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार के द्वारा दो बार ‘आजीवन कारावास’ की सजा सुनाई गई। अंडमान की सेल्युलर जेल (काला पानी) की अंधेरी कोठरियों में उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गईं, जिसे सुनकर आज भी हृदय कंपकपा जाता है। कोल्हू चलवाया गया, भूखा रखा गया, लेकिन सावरकर का हौसला नहीं टूटा। जब उन्हें लिखने के लिए कागज-कलम नहीं दिया गया, तो उन्होंने जेल की दीवारों पर कांटों और कोयले से हज़ारों कविताएं उकेर दीं।
अखण्ड भारत की परिकल्पना
वीर सावरकर केवल क्रांतिकारी ही नहीं थे, अपितु वे एक प्रखर चिंतक और समाज सुधारक भी थे। वे जातिवाद और छुआछूत के घोर विरोधी थे। रत्नागिरी में नज़रबंदी के दौरान उन्होंने ‘पतित पावन मंदिर’ बनवाया, जहाँ समाज के हर वर्ग के व्यक्ति को प्रवेश की अनुमति थी। उन्होंने ऐसे अखण्ड भारत की परिकल्पना की थी, जिसमें राष्ट्र ही सर्वोपरि हो।
इच्छामृत्यु का मार्ग चुना
वीर सावरकर का मानना था कि ‘जब जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाए और शरीर कार्य करने के योग्य न रहे, तो मृत्यु की प्रतीक्षा करने की बजाय उसे स्वयं चुनना चाहिए।’ उन्होंने ‘आत्मार्पण’ (इच्छा मृत्यु) का मार्ग चुना और अन्न-जल त्याग दिया तथा 26 फ़रवरी 1966 को अखण्ड भारत का सपना लिए इस क्रान्तिकारी नायक ने अपने शरीर को त्याग दिया। भारतीय इतिहास में इस महान धर्मयोद्धा का नाम अजर-अमर रहेगा।




























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