नई दिल्ली। शोधकर्ताओं की मानें तो अंटार्कटिका बर्फ से ढंका महाद्वीप है और यह अपने अन्दर अनगिनत रहस्यों को समेटे हुए है, इन्हीं रहस्यों में से एक है यहां मौज़ूद उल्कापिंड, जो अनगिनत संख्या में अंटार्कटिका की सतह पर जमा हैं।
जलवायु परिवर्तन की वजह से अंटार्कटिका में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिसके चलते सालाना करीब 5,000 उल्कापिंड बर्फ की गहराइयों में दफन हो रहे हैं। शोधकर्ताओं ने ताजा अध्ययन में इसका खुलासा किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति से लेकर, चंद्रमा के निर्माण समेत कई ऐसे रहस्य हैं, जिनके जवाब इन उल्कापिंडों से मिल सकते हैं।
बेल्जियम, स्विट्जरलैंड और यूके के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है। बताया गया है कि अंटार्कटिका से उल्कापिंड एकत्र करने की दर से पाँच गुना तेज इनकी संख्या घट रही है। वहां से हर साल औसतन 1,000 उल्कापिंड एकत्र किए गए हैं। पृथ्वी पर अब तक करीब 80,000 उल्कापिंड खोजे गए हैं, जिसमें 60 फीसदी अंटार्कटिका की सतह पर पाए गए हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहां अभी 3 से 8.50 लाख उल्कापिंड एकत्र किए जाने बाकी हैं।
सिकुड़ीं बर्फ की चट्टानें
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अंटार्कटिका में 40 प्रतिशत से अधिक बर्फ की चट्टानें सिकुड़ चुकी हैं और इनमें से आधी में सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। 1979 से सैटेलाइट से अंटार्कटिका पर नज़र रखी जा रही है। बढ़ते तापमान की वजह से पिछले 25 वर्षों में अंटार्कटिका करीब साढ़े सात लाख करोड़ टन बर्फ खो चुका है।
प्रयासों में तेजी लाने का आह्वान
अंटार्कटिका धरती के सात महाद्वीपों में से एक है, जो 140 लाख वर्ग किमी में फैला हुआ है। इसे दुनिया का आखिरी छोर भी कहा जाता है। अंटार्कटिका में तापमान चार डिग्री सेल्सियस से भी कम रहता है। इसकी बर्फ में ऐसे कई रहस्य दफन हैं, जो विज्ञान की दृष्टि से बहुत मायने रखते हैं। ऐसे में इन उल्कापिंडों को पुन: प्राप्त करने के प्रयासों में तेजी लाने का आह्वान किया गया है।




























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