दुनिया भर में सड़क निर्माण को विकास की बुनियादी आवश्यकता माना जाता है, लेकिन ताजा वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दीगई है कि यही सड़कें भविष्य के पर्यावरणीय विनाश और नई महामारियों की नीव भी बन सकती हैं। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया में करीब 2.5 करोड़ किलोमीटर नई पक्की सड़कें बनेंगी, जिनमें से लगभग 90 फीसदी निर्माण जैव-विविधता से भरपूर उष्णकटिबंधीय इलाकों में होगा। वैज्ञानिकों ने अब एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो पहले ही यह संकेत दे सकती है कि कहां सड़कें बनेंगी, कहां जंगल कटेंगे और कहां से इंसानों के लिए नई बीमारियों का ख़तरा जन्म ले सकता हैं?
आस्ट्रेलिया की जेम्स कुक यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकतार्ओं के सहयोग से किए गए एक नए अध्ययन के मुताबिक, दुनिया इस समय सड़क निर्माण की अभूतपूर्व दौड़ में शामिल है। आने वाले दशकों में बनने वाली 2.5 करोड़ किलोमीटर नई सड़कों का बड़ा हिस्सा उन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होगा, जहां पृथ्वी की सबसे समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। यही इलाके कार्बन संतुलन, जलवायु नियंत्रण और असंख्य प्रजातियों के अस्तित्व के लिए अहम माने जाते हैं। अमेजन, एशिया-प्रशांत और अफ्रीका के जंगलों में किए गए अध्ययनों से सामने आया है कि ज़मीन पर मौजूद सड़कों की वास्तविक लंबाई सरकारी आंकड़ों से कई गुना अधिक है। अध्ययन से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर बिल लॉरेंस के अनुसार, ब्राजील के अमेजन, एशिया-प्रशांत क्षेत्र और अन्य उष्णकटिबंधीय इलाकों में नक्शों के ज़रिये किए गए विश्लेषण बताते हैं कि वास्तविक सड़क नेटवर्क, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज़ सड़कों की तुलना में 13 गुना तक अधिक हो सकता है।
जंगल से इंसान तक पहुंचेंगी बीमारियाँ
सबसे चिंताजनक पहलू स्वास्थ्य से जुड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब जंगलों के भीतर सड़कें बनती हैं, तो वे इंसानों को सीधे उन इलाकों तक पहुंचा देती हैं, जहां जंगली जानवरों में पनपने वाले रोग मौजूद होते हैं। यही सड़कें जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों का सबसे आसान रास्ता बन जाती हैं। नई तकनीक की मदद से उन क्षेत्रों की भी पहचान संभव है, जहां भविष्य में नई महामारियों की चिंगारी सुलग सकती है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के दौर में यह ख़तरा और भी गंभीर माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार सड़कें सिर्फ बीमारियों का रास्ता नहीं खोलतीं, बल्कि विदेशी खरपतवारों और आक्रामक प्रजातियों के फैलाव का माध्यम भी बनती हैं। ऐसी प्रजातियां अक्सर सड़कों के किनारे तेजी से पनपती हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुक़सान पहुंचाती हैं। इस लिहाज से यह टूल उन इलाकों को भी चिन्हित कर सकता है, जहां जैव विविधता पर बहुआयामी ख़तरे मंडरा रहे हैं।





























Views Today : 9
Views Last 7 days : 274
Views Last 30 days : 856
Views This Year : 3350
Total views : 103823
Who's Online : 0
Your IP Address : 216.73.216.139