मथुरा। पर्वतराज की भूमि गोवर्धन का कण-कण कृष्ण लीलाओं की गवाही देता है। तलहटी के प्रमुख मंदिर भव्यता का साकार रूप हैं, लेकिन हरदेव मंदिर का सन्नाटा तलहटी के ऐश्वर्य को चुनौती देता है।
गोवर्धन में हरदेव मंदिर के बारे में मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहाँ गोवर्धन को कान्हा सात दिन तक अपने बाएं हाथ की कनिष्ठा ऊंगुली पर धारण किये रहे। चूंकि श्रद्धा और विश्वास के दम पर चलती परंपरा इतिहास के दावों की मोहताज नहीं होती, इसलिए भक्तों का सैलाब इस मंदिर के आंगन को छूकर नहीं जाता।
यादव कुल के पुरोहित गर्गाचार्य ने गर्ग संहिता लिखी है। इसमें उल्लेख है कि हरदेव मंदिर वही जगह है, जहाँ श्रीकृष्ण ने इंद्रदेव का मान मर्दन करने के लिए गोवर्धन धारण किया था। गर्गाचार्य श्रीकृष्ण के समकालीन हैं, इसलिए इसे जानकार सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य मानते हैं, मगर गोवर्धन आने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं को इस ऐतिहासिक विरासत की कोई जानकारी ही नहीं है। परिणामत: गोवर्धन के प्रमुख मंदिरों में वैभव सिमट कर रह जाता है। वैभव से परिपूर्ण गोवर्धन में प्राचीन विरासत स्वरूप हरदेव मंदिर में सन्नाटा छाया रहता है। धार्मिक इतिहास के इस महत्त्वपूर्ण स्थल की ओर से शासन-प्रशासन लापरवाह बना हुआ है।
गर्ग संहिता में उल्लेख है
गर्ग संहिता के अनुसार, कान्हा ने ब्रजवासियों से इंद्रदेव की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाई, तथापि इंद्र ने कुपित होकर मेघमालाओं को ब्रजभूमि बहाने का हुक्म दिया, तब इसी स्थान पर सात वर्ष के सांवरे ने सात दिन और सात रात तक गिरिराज को अपने बाएं हाथ की कनिष्ठ उंगली पर धारण करके ब्रजभूमि को बचा लिया था।
मंदिर का निर्माण मध्यकाल में
इतिहास के पन्नों में दजऱ् है कि मंदिर का निर्माण मध्यकाल में मानसिंह के पिता राजा भगवान सिंह ने कराया था। सेवायत लक्ष्मी नारायण गोस्वामी के अनुसार, मंदिर के संचालन को राजाज्ञा के तहत पर्याप्त भूमि मिली थीं। इस मंदिर के संरक्षण के लिए 1871 में तत्कालीन कलेक्टर एफएस ग्राउज ने इसे राष्ट्रीय स्मारक की श्रेणी में बताया था।




























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