नई दिल्ली। देश में आर्थिक विकास के दावों के बीच एक अतिचिंताजनक तस्वीर सामने आई है। अप्रैल माह के आंकड़ों के मुताबिक, देश में बेरोजगारी की दर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है। औद्योगिक गतिविधियों और डिजिटल अर्थव्यवस्था में उछाल के बावजूद, श्रम बाजार में नए युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे हैं। इस स्थिति ने न केवल अर्थशास्त्रियों बल्कि नीति निर्माताओं की भी चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा है।
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन की डिग्री ले चुके युवाओं में बेरोजगारी दर सबसे अधिक है। डिग्री होने के बावजूद योग्यता के अनुरूप नौकरियां न मिलना एक बड़ा संकट बन चुका है। जहां ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पर निर्भरता और मौसमी बेरोजगारी बनी हुई है, वहीं शहरी क्षेत्रों में आईटी, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में छंटनी और नई भर्तियों में कमी के कारण युवा सड़कों पर हैं।
आपराधिक मार्ग पर बढ़ते क़दम: रोजगार न मिलने के कारण अधिकांश युवा आपराधिक मार्ग को अपनाने से नहीं हिचक रहे हैं। यदि सरकारों ने इस दिशा में जल्द ही सारगर्भित कदम नहीं उठाए, तो देश अपराधों का अरण्य बन सकता है।
अर्थशास्त्रियों की राय: प्रमुख आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों से रोजगार नहीं मापा जा सकता। सरकार को अब ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो ‘जॉबलेस ग्रोथ’ (बिना रोजगार के विकास) के बजाय ‘जॉब-ओरिएंटेड ग्रोथ’ (रोजगार-परक विकास) को बढ़ावा दें। इसके लिए मैन्युफैक्चरिंग हब को मजबूत करना और शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाना बेहद जरूरी है।




























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