लखनऊ। उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनाव कराने में देरी होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य रुक गए हैं, क्योंकि गांवों के विकास को गति देने वाली ग्राम पंचायतें अधिकार विहीन हैं। इसके परिणामस्वरूप बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाएं अधर में लटक गई हैं।
गांवों में सड़कों, नालियों और खड़ंजों का निर्माण कार्य पूरी तरह बंद है। हैंडपंपों की मरम्मत और नए रीबोर का काम न होने से पानी की समस्या बढ़ रही है और सफाई व्यवस्था ढप्प है। गांवों में नियमित साफ-सफाई न होने से गंदगी और बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
बजट का आवंटन प्रभावित: नए विकास कार्यों के लिए मिलने वाला सरकारी बजट प्रशासनिक पेंच में फंसा हुआ है। प्रशासनिक अधिकारी लापरवाह: प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कार्यभार अधिकारियों को सौंपा गया है, लेकिन उनकी लापरवाही तो जगजाहिर है। फंड जारी करने में देरी: अधिकारी कागजी औपचारिकताएं पूरी करने में जुटे हैं, जिससे जमीनी काम नहीं हो पा रहे हैं। जनता की सुनवाई बंद: ग्रामीणों को अपनी छोटी-मोटी समस्याओं के समाधान के लिए ब्लॉक मुख्यालयों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। रोजगार पर असर: मनरेगा के तहत मिलने वाले स्थानीय काम ठप्प होने से मज़दूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न होगया है। चुनाव की मांग: ग्रामीण जनता और स्थानीय नेताओं ने सरकार से जल्द से जल्द चुनाव प्रक्रिया बहाल करने की मांग की है।




























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