मध्यप्रदेश के ज़िला मैहर में स्थित माँ शारदा का मंदिर अपने अलौकिक चमत्कारों और रहस्यमयी आस्था के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि रात में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी यहां घंटियां गूंजती हैं और अदृश्य रूप से पूजा होती है तथा माता का दिव्य शृंगार होजाता है।
भारत भूमि रहस्यों और चमत्कारों से भरी पड़ी है। देश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनके आगे आज का आधुनिक विज्ञान और तकनीक भी नतमस्तक होजाती है। ऐसा ही एक परम पवित्र और रहस्यमयी धाम है मध्यप्रदेश के त्रिकूट पर्वत पर स्थित माँ शारदा का मैहर मंदिर। समुद्र तल से करीब 600 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां माता सती का हार गिरा था, जिसके कारण इस जगह का नाम ‘माई का हार’ यानी ‘मैहर’ पड़ा। लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका वह रहस्य है, जो सदियों से अनसुलझा है।
रात 9 बजे बंद होजाते हैं कपाट
आम दिनों में मैहर देवी मंदिर के कपाट रात 9:00 बजे भक्तों के लिए पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं। नियम के मुताबिक, मंदिर के पुजारी गर्भगृह की पूरी सफाई करते हैं, माता के वस्त्र-आभूषण व्यवस्थित करते हैं और मुख्य कपाट पर भारी ताला लगा देते हैं। इसके बाद मंदिर परिसर और पूरी पहाड़ी को खाली करवा दिया जाता है। रात के सन्नाटे में यहां किसी भी इंसान को रुकने की अनुमति नहीं होती।
यहीं से होती है रहस्य की शुरुआत
स्थानीय निवासियों और पीढ़ियों से जुड़े पुजारियों का दावा है कि कपाट बंद होने के बाद, रात के गहरे सन्नाटे में अक्सर मंदिर के भीतर से घंटियां बजने और मंत्रोच्चार की धीमी आवाजें सुनाई देती है और सबसे हैरान करने वाला दृश्य सुबह ब्रह्ममुहूर्त में देखने को मिलता है। जब मंदिर के सरकारी पुजारी सुबह-सुबह भारी सुरक्षा और नियमों के साथ गर्भगृह का ताला खोलते हैं, तो वे दंग रह जाते हैं। माता शारदा के चरणों में ताजे सुगंधित फूल (अक्सर चमेली के) चढ़े हुए मिलते हैं आ ैर माता का पहले से ही पूजन और शृंगार संपन्न हो चुका होता है। गर्भगृह में ताजे चंदन की खुशबू महक रही होती है और जल का पात्र बदला हुआ मिलता है।
आख़िर कौन करता है रहस्यमयी पूजा?
अब सवाल उठता है कि जब चारों तरफ कड़ा पहरा था और ताले बंद थे, तो बंद कपाट के पीछे आकर यह पूजा कौन कर गया? कौन करता है यह रहस्यमयी पूजा? पौराणिक कथाओं और स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, यह दिव्य पूजा कोई इंसान नहीं, बल्कि 12वीं सदी के महान वीर योद्धा ‘आल्हा’ और ‘ऊदल’ करते हैं। आल्हा और ऊदल बुंदेलखंड के चंदेल राजा परमाल के सेनापति थे और माता शारदा के परम भक्त थे। इतिहास कहता है कि इन दोनों भाइयों ने ही घने जंगलों के बीच इस ऊंचे पर्वत पर माता के इस मंदिर की खोज की थी। उन्होंने ही सबसे पहले देवी को ‘शारदा माई’ कहकर पुकारा था।
कहा जाता है कि आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर मां शारदा ने उन्हें ‘अमरत्व’ (कभी न मरने) का वरदान दिया था। मान्यता है कि अपने उसी वरदान और अटूट भक्ति के कारण वीर आल्हा आज भी अदृश्य रूप से जीवित हैं और हर रात सबसे पहले आकर अपनी ‘शारदा माई’ की आरती और पूजा करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ी के नीचे आज भी ‘आल्हा तालाब’ और उनका अखाड़ा मौजूद है, जो इस कहानी को बल देता है।
विज्ञान के पास नहीं है कोई जवाब
कई बार वैज्ञानिकों, तर्कवादियों और खोजी टीमों ने इस रहस्य के पीछे की सच्चाई जानने की कोशिश की। रात में कैमरे लगाने और कड़ी निगरानी रखने के प्रयास भी हुए, लेकिन इस अलौकिक घटना के पीछे का असली सच आज तक कोई नहीं जान पाया। भक्तों के लिए यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि साक्षात परमसत्ता की उपस्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण है। यही कारण है कि हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस दिव्य चमत्कार को महसूस करने और माता का आशीर्वाद लेने 1063 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर या रोप-वे के जरिए त्रिकूट पर्वत पर पहुंचते हैं।





























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