भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत और महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय की जयंती 22 मई को है। 18वीं शताब्दी की सामाजिक कुरीतियों के घोर अंधकार में उन्होंने शिक्षा, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जो मशाल जलाई, उसी की बदौलत आज का प्रगतिशील भारतीय समाज आकार ले सका है।
राजा राममोहन राय ने समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध सबसे पहली और मुखर आवाज़ उठाई।
सती प्रथा निषेध कानून (1829): अपनी भाभी को सती होते देखने के बाद उन्होंने इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने का कड़ा संकल्प लिया। उनके अथक प्रयासों के कारण ही ब्रिटिश सरकार को 1829 में सती प्रथा विरोधी क़ानून बनाना पड़ा।
महिला अधिकारों के पैरोकार: उन्होंने बाल विवाह का कड़ा विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह तथा महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाने की पुरजोर वकालत की। ब्रह्म समाज की स्थापना: वर्ष 1828 में उन्होंने ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म को रूढ़िवादिता, अंधविश्वास और मूर्तिपूजा के आडंबरों से मुक्त कराना था। सभी धर्मों का सम्मान: वे बहुभाषाविद थे और उन्होंने लोगों को सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाया। उन्होंने वेदों और उपनिषदों का बंगाली व अंग्रेज़ी में अनुवाद किया ताकि आम जनता अपनी संस्कृति को सही ढंग से समझ सके।
भारतीय पत्रकारिता के स्तंभ: राजा राममोहन राय ने ‘संवाद कौमुदी’ (बंगाली) और ‘मिरात-उल-अखबार’ (फारसी) जैसे समाचार पत्रों का संपादन किया। वे प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे और अखबारों को जन-जाग्रति का सबसे बड़ा माध्यम मानते थे।
वैश्विक नागरिक: वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों के बहुत बड़े समर्थक थे। फ्रांस और ब्रिटेन के विचारक भी उनके ज्ञान के कायल थे।
हम यह कह सकते हैं कि राजा राममोहन राय केवल एक समाज सुधारक नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी युगपुरुष थे। उनके द्वारा बोए गए आधुनिकता और समानता के बीज आज भी हमारे लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों को मज़बूती प्रदान कर रहे हैं।





























Views Today : 39
Views Last 7 days : 214
Views Last 30 days : 686
Views This Year : 9247
Total views : 109720
Who's Online : 0
Your IP Address : 162.251.85.8