जैसे ही जून के महीने में हवा रुकती है और उमस (Humidity) बढ़ती है, अक्सर लोगों की भूख बिल्कुल मर जाती है। पेट हमेशा भरा-भरा लगता है, खट्टी डकारें आती हैं और कुछ भी खाने का मन नहीं करता। आयुर्वेद के अनुसार, इस ऋतु संधि में ‘जठराग्नि’ (पाचन की आग) साल भर के अपने सबसे निचले और कमजोर स्तर पर होती है।
बाहर की उमस और शरीर के भीतर की गर्मी मिलकर भोजन को पचने नहीं देतीं, बल्कि उसे पेट में ‘सड़ाने’ (Ferment) लगती हैं। इस सड़े हुए भोजन से ही प्री-मानसून में फूड पॉइजनिंग और भयंकर गैस (वात) बनती है।
अदरक: सुस्त जठराग्नि का ‘स्टार्टर’
जब भूख न लगे, तो जबरदस्ती भारी खाना (जैसे परांठे, राजमा, पनीर) खाना पेट के साथ सबसे बड़ा अत्याचार है। इस मौसम में भोजन हमेशा बहुत हल्का (लघु) होना चाहिए। पाचन की आग को वापस भड़काने के लिए ‘ताजा अदरक’ सबसे महान प्राकृतिक औषधि है।




























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