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हमें अधर्म को बढ़ाने वाले कारक-नशे-मांसाहार, चरित्रहीनता, जातिभेद, छुआछूत आदि को समाप्त करना है : सौरभ द्विवेदी

नागपुर। भक्ति की खुशबू से अपने जीवन को महकाना पड़ेगा, गुरुवर जिस पथ पर जाने के लिए कहें जाना पड़ेगा और अगर गुरुवर का आशीर्वाद चाहिए, गुरुभक्ति का प्रसाद चाहिए, तो गुरुदेव जी जो बातें कहते हैं, उन बातों को अपनाना पड़ेगा।

ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आशीर्वाद से पंचशील नगर, लतामंगेशकर हॉस्पिटल रोड, ईसासनी, हिंगणा, ज़िला-नागपुर में दिनांक 6-7 दिसम्बर 2025 को आयोजित 24 घंटे के श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ के समापन अवसर पर भगवती मानव कल्याण संगठन के केन्द्रीय महासचिव और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौरभ द्विवेदी ‘अनूप’ जी ने उपस्थित जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘‘हमारे जीवन में सुख-दु:ख आते-जाते रहते हैं। दु:ख आने पर भले ही हम परिजनों, समाज को, अपने सहकर्मियों को दोष देते हैं, लेकिन इसके लिए हम स्वयं उत्तरदायी होते हैं, क्योंकि हम जैसा कर्म करते हैं, उसी अनुरूप सुख-दु:ख की प्राप्ति होती है। इसी तरह दुनिया में लोग तो बहुत हैं, लेकिन देश व समाज का उद्धार कैसे होगा? इसके लिए जो गिने-चुने धर्मवान लोग हैं, वही धर्म-कर्म को बढ़ाने वाले होते हैं। तो, हम जितने भी लोग हैं, एकजुटता के साथ अधर्म को बढ़ाने वाले कारक-नशे-मांसाहार, चरित्रहीनता, जातिभेद, छुआछूत आदि को समाप्त करना है।

    यदि हम इन कारकों से मुक्त हैं, इनसे मुक्त रहने का संकल्प लिए हुए हैं, तो यकीन मानिए जिस तरह सियारों के बीच सिंह विचरता है, उसी तरह भगवती मानव कल्याण संगठन के लोग हैं। अगर हम  सौ हैं, तो एक हज़ार के बराबर हैं, एक हज़ार हैं, तो पचास हज़ार के बराबर हैं और जहाँ पचास हज़ार हैं, वहाँ पचास लाख के बराबर होंगे, क्योंकि हम सभी की चेतनाशक्ति प्रभावक है। हमें ज़्यादा कुछ नहीं करना है, केवल अपने जीवन का कल्याण करना है, समाज का कल्याण स्वमेव होता चला जाएगा। 

हम गुरु क्यों बनाते हैं? गुरु एक प्रकाश है। गुरु एक माध्यम है, सत्य का पथ दिखाने के लिए, जिस पर समर्पणभाव से चलने की आवश्यकता है और यदि हम समर्पित हैं, तो वहाँ पहुंच जाते हैं, जहाँ हम पहुंचना चाहते हैं। सौभाग्यशाली हैं वे लोग, जो इस धरती पर गुरु बनाते हैं और जिसको चेतनावान् गुरु की प्राप्ति होजाए, तो उससे बड़ा सौभाग्यशाली अन्य कोई हो ही नहीं सकता। हम सभी परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्य हैं और हमारा यह पहला कर्त्तव्य बनता है कि गुरुवरश्री के कर्ममय जीवन को देखें, उनके जीवन को अपने जीवन से मिलाएं तथा उनकी दिनचर्या का अनुकरण करें। यदि शिष्य का जीवन अपने सद्गुरु के जीवन के समान नहीं है, तो कहीं-न-कहीं हमारे शिष्यत्व में कमी है।

हमें सद्गुरुदेव जी महाराज की जीवनचर्या से जीने की कला सीखनी है। सबसे पहले हमें वर्तमान को संवारना है, वर्तमान का जीवन जीना है, क्योंकि वर्तमान ही भविष्य को बनाता है। अपने मनमस्तिष्क पर अनावश्यक बोझ मत डालें; ‘माँ’ की आराधना करें, सद्कर्म करें, शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए योग-ध्यान-साधना, प्राणायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें। क्योंकि यह शरीर ही धर्म-कर्म करने का सबसे बड़ा माध्यम है। शरीर माध्यम खलु धर्मसाधनम्।’’

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