मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में 03 दिसम्बर सन् 1984 को एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे लगभग 8000 से अधिक लोगों की जान गई तथा लाखों लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए।
भोपाल गैस काण्ड में मिथाइलआइसोसाइनेट नामक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ था। जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था। सन् 2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 5,58,125 लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या लगभग 38,478 थी। 3900 तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गये।
भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और उसके पयार्वास को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता रहा है। इसीलिए 1993 में भोपाल की इस त्रासदी पर बनाए गये भोपाल-अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को जानने का काम सौंपा गया था।
दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव:- भोपाल की लगभग 5 लाख 58 हज़ार लोग इस विषैली गैस से सीधे रूप से प्रभावित हुए, जिसमे 2,00,000 लोग 15 वर्ष की आयु से कम थे और 3,000 गर्भवती महिलायें थी, उन्हे शुरुआती दौर में तो खासी, उल्टी, आंखों में उलझन और घुटन का अनुभव हुआ। दस्तावेजों के अनुसार, गैस रिसाव के अगले दो सप्ताह के भीतर 8000 लोगो की मृत्यु हुई, जबकि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा गैस रिसाव से होने वाली मृत्यु की संख्या 3,787 बतलायी गयी है।





























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