नई दिल्ली। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं। कोविड महामारी के दौरान भी इस बात को इन्होंने सिद्ध कर दिखाया। इन महिलाओं ने अदम्य साहस दिखाते हुए बिना किसी लालच या सम्मान पाने की चाहत के टीकाकरण जारी रखकर लाखों बच्चों और मांओं की जिन्दगियाँ बचाईं। मानदेय कम होने के बावजूद उनमें जज़्बे की कमी तब भी नहीं दिखी थी और आज भी नहीं दिखती। लेकिन सरकारों का इनको लेकर रवैया उत्साहजनक दिखाई नहीं दे रहा है।
आज भी गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, असम आदि राज्यों में ये स्वास्थ्यकर्मी गांवों में अनवरत काम कर रही हैं। हाल में गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों के दौरे में इन कर्मचारियों को लगन से काम करते देख कर लगा कि इनके जज्बे में कोई कमी नहीं आई है। नर्मदा जिला पूर्ण रूप से आदिवासी जि़ला है, जहां के नर्मदा घाटी में सरदार पटेल की आकर्षक मूर्ति बनाई गई है। गुजरात में 14 आदिवासी जि़ले हैं जहां ये आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को आप लगन से काम करते देख सकते हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को राज्य सरकारें मानदेय देती है जो हर राज्य में अलग-अलग होता है। दिल्ली में जहां यह 12,720 रुपए प्रतिमाह है और सहायिकाओं का 6810 रुपए है, वहीं मध्यप्रदेश में यह 15 से 18 हज़ार रुपये तक है, जबकि वहां सहायिकाओं को लगभग 10,000 रुपए मिलता है। कुछ राज्यों में तो इन्हें पांच-छह हजार रुपए ही मानदेय के रूप में मिलते हैं। इतने कम पैसों में भी वे एक समाजिक उत्तरदायित्व का महत्त्वपूर्ण काम करती हैं। कई बार वे आवाज़ भी उठाती हैं, लेकिन वे सरकारी कर्मचारी नहीं मानी जाती हैं और इसलिए राज्य सरकारें इन पर उतना ध्यान नहीं देती हैं। इनके काम को देखने के बाद लगता है कि इन्हें अपने काम से ज़्यादा सम्मान की ज़रूरत है।




























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