शरीर को चलायमान रखना है, चैतन्य रखना है, तो प्रत्येक जीव-जन्तु को श्वास लेना अतिआवश्यक है। जब तक श्वास चलती रहती है, हमारा जीवन भी चलता रहता है और श्वास के रुकते ही हमारा जीवन भी रुक जाता है।
श्वास लेना एक कला है। हम इसे व्यवस्थित तरीके से ग्रहण करें। जीवन तो सभी का चलता रहता है, चाहे वह बच्चा हो, युवा या बुजुर्ग हो। जब हमारे शरीर में श्वास का आदान-प्रदान सही ढंग से नहीं हो पाता है, तो स्वस्थ शरीर भी कुछ समय में ही रोगयुक्त होने लगता है। शरीर में आलस्य, जड़ता एवं अनेक प्रकार के विकार आने लगते हैं और जीवन नीरस लगने लगता है, जिसका अंत दु:खदायी होता है। इसी के साथ ही अगर हम श्वासों को सही ढंग से लेने की क्रिया को जान लेते हैं और पूर्ण कला के साथ श्वास लेना प्रारम्भ करते हैं, तो शरीर के अनेक रोग बगैर दवा के दुरुस्त हो जाते हैं, शरीर चैतन्य एवं ऊर्जावान् हो जाता है और किसी भी कार्य को पूर्ण करने में मन लगता है। आवश्यकता है कि एक सही तरीके से श्वास लेने की प्रक्रिया को हम अपने जीवन में अपना लें।
अष्टांग योग में कहा गया है कि श्वास सदैव गहरी ही लेनी चाहिए। श्वास के माध्यम से हमारे शरीर में ऑक्सीजन प्रवेश करती है। हम जितनी गहरी श्वास लेते है, उतनी ही ज्यादा मात्रा में ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश करती है। जितनी ज्यादा मात्रा में ऑक्सीजन हमारे शरीर में जायेगी, शरीर उतना ही स्वस्थ रहेगा।
हल्की एवं उथली श्वास, जो गले एवं छाती के ऊपरी हिस्से तक जाती है, लेने से शरीर में ऑक्सीजन की पूर्ति नहीं हो पाती है और शरीर धीरे-धीरे आलस्य एवं रोगों से घिरने लगता है।
छोटे बच्चे गहरी श्वास लेते है, इसीलिए उनकी नाभि धड़कती रहती है। परन्तु, जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, श्वास-प्रश्वास उथली होने लगती है और नाभि का धड़कना भी बन्द हो जाता है। अत: श्वास को पूर्ण गहरी लें, ताकि नाभि प्रदेश तक जा सके।
श्वास गहरी लेने पर फेफड़े पूरी तरह से फूलते-पिचकते हैं। शरीर में रक्त की शुद्धि फेफड़ों से ही होती है। अत: जितनी ज्यादा गहरी श्वास लेंगे, उतनी ही ज्यादा शुद्ध ऑक्सीजन फेफड़ों में जायेगी। इससे ज्यादा मात्रा में रक्त शुद्ध हो सकेगा और शरीर स्वस्थ रह सकेगा।
अष्टांग योग में प्राणायाम इसीलिए बताया गया है। गहरी श्वास अन्दर लें और धीरे-धीरे निकालें। इससे ऑक्सीजन ज्यादा से ज्यादा हमारे शरीर में जाती है। इसी ऑक्सीजन के साथ ही प्राण ऊर्जा भी हमारे शरीर में अधिक मात्रा में प्रवेश करके समस्त नस-नाडिय़ों तथा समस्त अंगों को ऊर्जा से भरपूर करती है और शरीर पूर्ण चैतन्यता से कार्य करता है तथा लम्बे समय तक जीवित रहता है।
बृजपाल सिंह चौहान
वैद्यविशारद, आयुर्वेदरत्न
(गुरुसेवक)





























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