नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पिछले साल जुलाई में रुपए में विदेशी व्यापार के सेटलमेंट का प्रस्ताव किया था और इसे अच्छा समर्थन मिला है। पड़ोसी श्रीलंका सहित दुनिया के 35 देशों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है। इस तरह के समझौते से दोतरफा लाभ होगा। निर्यात-आयात बिलों के भुगतान के लिए डॉलर नहीं खरीदना पड़ेगा। इस सम्बंध में भारत-रूस के बीच पिछले साल ही करार हुआ है। चीन ने भी कई देशों के साथ इसी तरह का समझौता किया है। इसी पीड़ा से बचने के लिए यूरोपीय संघ ने यूरो मुद्रा अपनाई है। यूरोपीय संघ के देश आपस में यूरो से लेन-देन करते हैं। बावजूद इसके डॉलर की दादागिरी कायम है।
यक्रेन पर रूसी हमले के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। ऐसे में रूस न सिर्फ भारत को किफायती दर पर कच्चा तेल दे रहा है, बल्कि उसने खास करार भी किया है। समझौते के तहत दोनों देशों के बीच रुपया-रूबल (रूस की मुद्रा) में भुगतान होगा। विदेशी मुद्रा में भुगतान के लिए डॉलर खरीदने की बाध्यता नहीं रहेगी।
गौरतलब है कि विदेश व्यापार से जुड़े भुगतान के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंक सोने के साथ डॉलर रखते हैं। जिन देशों के खजाने में डॉलर ज़्यादा जमा होता है, उनकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है।
मुद्रा बाज़ार के जानकार फिलहाल डालर की बादशाहत खत्म होने की संभावना को खारिज करते हैं, लेकिन वित्तीय सेवा प्रदाता क्रेडिट सुइस की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक डॉलर का एकाधिकार खत्म हो सकता है।
विकल्प तलाश रहे हैं कई देश
विदेश व्यापार बिलों के भुगतान के लिए महंगा डॉलर खरीदने में विकासशील ही नहीं विकसित देशों के भी पसीने छूट रहे हैं। सीधे तौर पर अमरीका को जितना फायदा होता है, बाकी देशों को उसी अनुपात में नुकसान। कई देश इस जटिल समीकरण से बाहर निकलने के लिए तडफ़ड़ा रहे हैं। किफायती विकल्प तलाश रहे हैं।
दुनिया के मौज़ूदा हालात में सबसे अच्छा विकल्प दो देशों की स्थानीय मुद्रा में सेटलमेंट का है। विदित है कि कई देशों ने विगत दिनों आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने का फैसला किया है।




























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