नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ ने गुरुवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या वह मुख्य चुनाव आयुक्त (ष्टश्वष्ट) और चुनाव आयुक्तों (श्वष्टह्य) को चुनने में अपनाए गए तरीके या अपनाए गए मानदंडों की व्याख्या कर सकते हैं। कोर्ट ने इसे परेशान करने वाली बात कहा कि भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त कभी एक महिला नहीं बन पाई। कोर्ट ने यह बात यह सुझाव देते हुए कही कि भारत के चुनाव आयोग में नियुक्ति के दौरान लिंग विविधता महत्त्वपूर्ण है।
कोर्ट में दायर याचिका में क्या है?
सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने जिस याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बातें कही हैं उस याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट लोकसभा और राज्यसभा की तरह ईसीआई के लिए स्वतंत्र सचिवालय हो स्वतंत्र बजट हो तीनों आयुक्तों को समान अधिकार मिलें यानी मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकार बाकी दोनों आयुक्तों को भी हों। जरूरत पडऩे पर आयुक्तों को भी हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया अपनाई जाए और स्थायी स्वतंत्र सचिवालय हो। साथ ही कोर्ट ने चुनाव की पारदर्शिता पर भी कई सवाल किए हैं।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान एक गंभीर टिप्पणी करते हुए कई बातें कही हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कोई तंत्र नहीं है और आप अपनी तरह से काम कर रहे हैं। क्या यह संविधान बनाने वाले लोगों की इच्छाओं को मारने का काम नहीं है? संविधान कहता है कि ऐसी नियुक्तियां संसद द्वारा किए जाने वाले कानून के प्रावधानों के अधीन होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।




























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