नई दिल्ली। प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 पर सुनवाई के दौरान केंद्र ने फिर से हीलाहवाली का रवैया अपनाया। सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें सरकार के आला अफसरों से विमर्श करने की ज़रूरत है। लिहाजा मामले को दिसंबर के पहले सप्ताह में लिस्ट किया जाए।
सीजेआई चन्द्रचूड़ और जस्टिस जेबी परदीवाला की बेंच ने जनवरी 2023 के पहले सप्ताह में मामले की सुनवाई तय की। बेंच का कहना था कि 12 दिसंबर से पहले हर हाल में काउंटर एफिडेविट दाखिल कर दिया जाए। कोर्ट ने ये भी आदेश दिया कि मामले को तीन जजों की बेंच को भेजा जाए। खास बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र से मार्च 2021 में जवाब मांगा था, लेकिन सरकार लगातार हीलाहवाली करती रही।
गौरतलब है कि प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 तब सामने आया था, जब राम जन्म भूमि को लेकर पूरे देश में माहौल गर्म था। इसके जरिये धार्मिक स्थलों में किसी तरह से बदलाव को रोकना था। इसमें कोर्ट धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों की सुनवाई नहीं कर सकती। एक्ट से राम जन्म भूमि को बाहर रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में रामलला के मंदिर के लिए भूमि को हस्तांतरित करते समय एक्ट को लागू किया था। हालांकि तब कोईट ने ये भी कहा था कि दूसरे धार्मिक स्थलों के मामले में ये लागू नहीं होगा।
बीजेपी के प्रवक्ता अश्वनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा कि एक्ट विदेशी आक्रांताओं के जुल्मों का समर्थन करता है। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध अपने धार्मिक स्थलों की बहाली के लिए आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख नहीं कर सकते हैं। एक्ट कहता है कि धार्मिक स्थलों की स्थिति 15 अगस्त 1947 जैसी रखी जाए।
याचिका में एक्ट को लेकर कहा गया कि राम जन्म भूमि को इससे बरी रखा गया है। लेकिन श्रीकृष्ण जन्म भूमि को इसके दायरे में ही रखा गया है। जबकि राम और कृष्ण दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं। एसजी तुषार मेहता ने बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 1991 में आया अयोध्या मामले का फैसले का एक्ट की वैधानिकता से कोई सीधा संबंध नहीं है।





























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