हसदेव, छग। इन दिनों छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। जंगलों की कटाई के विरोध में हसदेव में कई महीनों से लोग धरना दे रहे हैं और इसको लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। इन सबके बीच सच्चाई यह है कि हसदेव में जंगलों की कटाई धड़ाधड़ ज़ारी है। कोयले के खनन के लिए लगातार विस्फोटों से यह इलाका दहल रहा है।
छत्तीसगढ़ में 58000 मिलियन टन कोयले का भंडार है। यह पूरे देश में मौज़ूद कोयला भंडार का लगभग 21 फीसदी है। अकेले हसदेव अरण्य में छत्तीसगढ़ के कोयला भंडार का 10 फीसदी हिस्सा माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अगले 100 वर्षों के लिए कोयला छत्तीसगढ़ में उपलब्ध है।
हसदेव के अरण्य में कोयला निकालने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों ने समय-समय पर वैज्ञानिक शोध किए हैं। हसदेव का जंगल मध्यप्रदेश के कान्हा क्षेत्र से लेकर झारखंड के जंगलों तक जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि हसदेव का जंगल मौसम परिवर्तन में काफी अहम रोल अदा करता है। छत्तीसगढ़ के 184 कोयला खदानों में से 23 हसदेव के जंगलों में हैं।
हसदेव के जंगलों को लेकर भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एक रिपोर्ट में कहा कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में एक फीसदी हाथी हैं। यहां के जंगल में हर साल 60 से ज़्यादा लोग हाथियों के हमले में मारे जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हसदेव के जंगलों को काटा गया तो मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इतना ही नहीं, हसदेव के जंगलों के कटने से आदिवासियों की बसाहट भी कम होगी और मौसम के दुष्परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं।





























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